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Donald Trump: कहीं अमेरिका को गर्त में तो नहीं ले जा रहे ट्रंप!, टैरिफ वार समेत ये नीतियां बन सकती हैं काल

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निशा शुक्ला

अमेरिका। Donald Trump: दुनिया के तमाम देशों से लोग आकर अमेरिका में एक साथ रहते हैं। यहां के संसाधन और अवसर प्रतिभाशाली व्यक्तियों को आकर्षित करते हैं। मेहनत करने वालों को यहां सफलता प्राप्त होती है। एक ऑस्ट्रियाई बॉडी बिल्डर यहां आकर एक प्रसिद्ध अभिनेता बना और बाद में कैलिफोर्निया का गवर्नर भी बना। क्या ऐसा किसी अन्य देश में संभव है? यही तो ‘अमेरिकन ड्रीम’ का सार है, लेकिन, नए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस बार देश की कमान संभालते ही सब कुछ बदल दिया है। ट्रंप के समर्थक अब भारतीयों सहित सभी प्रवासियों के खिलाफ हो गए हैं। वे चाहते हैं कि अमेरिका में बाहरी लोगों का आना बंद हो जाए। उनका मानना है कि इमिग्रेशन नौकरी में कमी, कम वेतन और अपराध में वृद्धि का कारण है। आइए, समझते हैं कि ट्रंप की किन नीतियों के कारण अमेरिका को नुकसान हो रहा है।

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इमिग्रेशन की जद में आये भारतीय

अमेरिका में मूल अमेरिकी मात्र 2 फीसदी हैं। बाकी 98 फीसदी लोग बाहर से आकर बसे हैं। वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पिता भी जर्मन थे। मेलानिया स्लोवेनिया से हैं। जेडी वेंस स्कॉट्स-आयरिश हैं और उनकी पत्नी मूल रूप से भारत की हैं। ट्रंप ने चुनाव में इमिग्रेशन को मुद्दा बनाया था अब जीतने के बाद वे इस पर सख्ती से कार्रवाई भी कर रहे हैं। तमाम भारतीय भी इस कार्रवाई की जद में आये और इससे उन्हें परेशानी उठानी पड़ी। कुछ फ्लाइट्स अवैध प्रवासियों को लेकर अमृतसर भी आईं। वहीं जिनके पास पूरे कागजात नहीं थे, उन्हें पनामा में कैदियों की तरह रखा गया।

ग्रीन कार्ड और H-1B वीजा धारकों का भविष्य भी खतरे में

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कहा जा रहा है कि, डोनाल्ड ट्रंप की इमिग्रेशन नीतियों के चलते अमेरिका में  ग्रीन कार्ड और H-1B वीजा धारकों का भविष्य भी खतरे में है। यहां घूमने आने वाले भी परेशान हैं। ट्रंप जन्म से नागरिकता के नियम में भी बदलाव करना चाहते हैं। फ़िलहाल ये मामला वहां की सुप्रीम कोर्ट में है। आशंका जताई जा रही है कि, इस तरह की सख्ती की वजह से अब पढ़े-लिखे और टैलेंटेड लोग अमेरिका की तरफ कम आकर्षित होंगे। ऐसे में अमेरिकी कंपनियों को सॉफ्टवेयर जैसे काम बाहर भेजने होंगे। वहां नौकरियों में कमी आएगी। सैलरी और कीमतों में इजाफा होगा। इमिग्रेंट्स के बिना काम करने वाले कम होंगे। महंगाई की वजह से मांग के कमी आएगी। नतीजतन, देश में मंदी आने की संभावना बढ़ जाएगी।

 टैरिफ वॉर से बढ़ेगी महंगाई 

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अमेरिका खरीदारी के लिए अच्छी जगह है, क्योंकि कीमतें कम हैं। यहां कंपनियों को भी अच्छा मुनाफा होता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि यहां सरकार सामानों पर कम टैक्स लगाती है। 2022 में अमेरिका में आयात पर मात्र 1.5% टैक्स था जबकि ऑस्ट्रेलिया, यूरोपियन यूनियन और कनाडा में इससे भी कम टैक्स था। अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश है। चीन में यह टैक्स 3% से अधिक है।

वहीं भारत में तो 11.5% टैक्स है। यही वजह है कि लोग अमेरिका में खरीदारी करना ज्यादा पसंद करते हैं। ऐसे में अगर टैक्स लगाने में ट्रंप अपनी मर्जी चलाते है तो यहां आने वाले समय में चीजें महंगी हो जाएंगी। देश में बनने वाली चीजों की कीमतों में भी इजाफा होगा। हालांकि अभी तो कुछ चीजों पर ही टैक्स लगा है, जैसे कार और स्टील। यह टैक्स 10% से 25% तक है,  लेकिन इससे इनकी कीमतें और बढ़ सकती हैं। 2 अप्रैल से ‘reciprocal tariffs’ लागू होने की संभावना है। इसका मतलब है, अगर अमेरिका किसी देश से आने वाले सामान पर टैक्स लगाएगा, तो दूसरा देश भी अमेरिकी वस्तुओं पर टैक्स लगाएगा। इससे हर चीज के दाम बढ़ जाएंगे।

आ सकती है मंदी

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वैश्विक व्यापार एक मशीन की तरह चलता है। अचानक टैक्स लगाने से इसमें रुकावट आएगी, इसलिए टैक्स की बात हो आते ही शेयर बाजार में हलचल मच जाती है। ट्रंप का मानना है कि टैक्स से कंपनियां अमेरिका में ही फैक्ट्रियां लगाएंगी और अपने देश में ही मोटी कमाई करेंगी, लेकिन इसमें कई साल लग सकते हैं। चीन से कम कीमत पर मुकाबला करना मुश्किल है। कहा जा रहा है कि ट्रंप की इन नीतियों से सबसे ज्यादा नुकसान अमेरिकी लोगों को होगा, क्योंकि चीजें महंगी होंगी, तो लोग कम खरीदेंगे, जिससे मंदी आने का खतरा बढ़ जायेगा।

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पेरिस समझौते से हटना बड़ी गलती

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उल्लेखनीय है कि 1970 के दशक में जलवायु परिवर्तन पर ध्यान देना शुरू किया गया थे, तब अमेरिका ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई थी। 1970 में अमेरिका ने ‘Environmental Protection Agency’ (EPA) बना कर दुनिया को जलवायु परिवर्तन पर ध्यान देने का रास्ता दिखाया था। वहां ‘Clean Air Act’ जैसे कानून बनाए गए। अमेरिका जलवायु पर रिसर्च में सबसे आगे रहा। उसने ‘UNFCCC’ के जरिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का एक प्लान बना था, जिससे 2015 में ‘Paris Agreement’ पर बात बनी थी, लेकिन अब ट्रंप ने अमेरिका को पेरिस समझौते से अलग कर लिया।

खराब पानी पीने को मजबूर होंगे 4 करोड़ लोग

ट्रंप की इस नीति से अमेरिका और कनाडा के 4 करोड़ से ज्यादा लोगों के पानी की क्वालिटी पर असर होगा। उन्हें खराब पानी पीने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। ‘DOGE’ ने EPA के वकीलों को हटा दिया है, जिससे कारखानों से निकलने वाले गंदे पानी को अब रोकने वाला कोई नहीं है। अमेरिकी शहरों में धुंधला आसमान फिर दिखेगा। नदियां गंदी होंगी। जहरीला कचरा और कारखानों का गंदा पानी फिर से सड़कों पर दिखेगा, जिससे जलवायु संकट और गहराएगा। गर्मी, आग और बाढ़ का खतरा बढ़ेगा। अमेरिकियों की सेहत, नौकरी, शहर, पेड़-पौधे और जानवर सब खतरे में होंगे।

विश्वविद्यालयों के फंड में कर रहे कटौती

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द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सैनिकों को GI बिल से कॉलेज भेजा गया। आज भी कई लोग कालेज जाने को बड़ी उपलब्धि मानते हैं। अमेरिकी सरकारें हमेशा उच्च शिक्षा का समर्थन करती रही हैं। इससे रिसर्च को बढ़ावा मिलता है और लोगों की काम करने की क्षमता बढ़ती है। उनकी आर्थिक स्थिति सुधरती है,  लोग घर खरीद पाते हैं, लेकिन  ट्रंप विश्वविद्यालयों को उतना सम्मान नहीं देते। ऐसे में विश्वविद्यालयों के फंड में कटौती कर रहे हैं। ट्रंप के इस फैसले से छात्रों की स्कॉलरशिप में कटौती की जा सकती है। रिसर्च भी कम होगा। टीचरों को बड़ी क्लास में पढ़ाना होगा। अगर विश्वविद्यालयों का महत्व कम हुआ, तो अमेरिका रिसर्च और कारोबार में पिछड़ सकता है। अच्छे कॉलेजों में एडमिशन, अमीर और ऊंचे कुल के लोगों को रोकने का एक तरीका था। अगर यह तरीका कमजोर हुआ, तो समाज में बराबरी लाना मुश्किल होगा।

रिसर्च पर पड़ेगा असर

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अमेरिका हमेशा विज्ञान, तकनीक और शिक्षा को आगे बढ़ाता रहा है। इससे देश आगे बढ़ता है, लोगों की जिंदगी बेहतर होती है और भविष्य अच्छा होता है। पर आजकल खोज और रिसर्च पर खतरा है। ट्रंप ने DEI की समीक्षा के लिए सारे सरकारी पैसे रोक दिए। इससे वैज्ञानिक रिसर्च के लिए अच्छे लोगों को लेने में दिक्कत हो रही है। दो वैज्ञानिक बोर्ड भी हटा दिए गए हैं।

धीमी हो सकती है तरक्की की रफ्तार

ट्रंप के फैसले से परेशान EPA (Environmental Protection Agency) अमेरिका में अपने विज्ञान अनुसंधान दफ्तर को बंद करने की प्लानिंग कर रहा है। इससे 1,000 से अधिक वैज्ञानिक और कर्मचारी बेरोजगार हो जाएंगे। ये लोग विज्ञान के लिए जरूरी खोज करते थे। सभी वीजा योजनाओं की जांच हो रही है। इसका असर विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में काम करने वालों पर पड़ेगा। विज्ञान से जुड़े सरकारी खोज और शिक्षा कार्यक्रमों का बजट कम किया जा रहा है। पैसे की कमी और संस्थाओं के बंद होने से खोज और विकास पर बुरा असर पड़ रहा है। इससे देश की तरक्की और लोगों की जिंदगी में सुधार की रफ्तार धीमी हो सकती है।

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