
नई दिल्ली। China–Pakistan Economic Corridor: बलूचिस्तान ने इस समय अपनी आजादी की लड़ाई तेज कर दी है। बीएलए के लड़ाके आए दिन पाक आर्मी हमले करते रहते हैं। वे पाकिस्तान से अलग राष्ट्र की मांग कर रहे हैं। आइए जानते हैं बलूचिस्तान पाकिस्तान से क्यों अलग होना चाहता हैं और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा यानी CPEC बलूचिस्तान में विकास की बजाय असंतोष और संघर्ष की वजह क्यों बन रहा है?, जिसका यहां के लोगों की चिंताओं और भू राजनीति पर क्या असर पड़ेगा।
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दशकों से कर रहे हैं आजादी का संघर्ष

दुनिया के नक्शे पर 1947 में जन्म लेने वाले पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रान्त बलूचिस्तान है, लेकिन आज ये इलाका पाकिस्तान से अलग होने के लिए संघर्ष कर रहा है। एक तरफ तो बलूच लोग दशकों से आजादी के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तो वहीं दूसरी तरफ चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा यानी CPEC के ज़रिए अरब सागर तक अपनी पहुंच बनाने के लिए चीन ने अरबों डॉलर का निवेश किया है। ड्रैगन ने बीते सात मई को भारत द्वारा चलाए गए सैन्य अभियान ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में पाकिस्तान का खुलकर समर्थन किया था। उसका एक ही खास मकसद था CPEC को बचाना और भारत के सामने एक नई चुनौती पेश करना।
मिनिरल्स से भरपूर है बलूचिस्तान
पाकिस्तान के चार प्रांतों पंजाब, सिंध, खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में बलूचिस्तान का क्षेत्रफल सबसे ज्यादा 44% है। यहां की जमीन में प्रचुर मात्रा में मिनिरल्स है और पाकिस्तान इस क्षेत्र के संसाधनों का भरपूर दोहन करता है, लेकिन यहां के लोगों के जीवन स्तर को सुधारने में कोई रुचि नहीं दिखाता। यह क्षेत्र तेल, गैस, सोना और तांबे जैसे खनिजों से समृद्ध है। यहां स्थित रेको डिक खदान दुनिया की सबसे बड़ी तांबा-सोने की खदानों में से एक है। इतनी अधिक मात्रा ने प्राकृतिक संपदा से समृद्ध होने के बावजूद ये पाकिस्तान का सबसे पिछड़ा क्षेत्र है। यहां कि साक्षरता दर बेहद कम है। यहां बुनियादी सुविधाएं लगभग न के बराबर हैं।
गांधार सभ्यता का हिस्सा था बलूच
प्राचीन काल में, ये प्रान्त मकरान और गांधार सभ्यता का हिस्सा हुआ करता था। सिकंदर की सेना भी इसी इलाके से गुज़री थीं। महाभारत में इस इलाके का जिक्र “बह्लिका” के नाम से है। यहां के योद्धा भूरिश्रवा ने महाभारत के युद्ध में कौरवों की तरफ़ से लड़ाई लड़ी थी। ईरान, अफगानिस्तान और अरब सागर से घिरे इस इलाके की आबादी लगभग 15 मिलियन है। यहां बलूच, पश्तून और अन्य जन जातियां रहती हैं। 1947 में जब भारत-पाकिस्तान का बंटवारा हुआ था, तब चार रियासतों – कलात, खरन, लास बेला, और मकरान को मिलाकर बलूचिस्तान प्रान्त बना था।
11 अगस्त 1947 को किया था आजादी का ऐलान

भारत की आजादी मात्र चार दिन पहले यानी भारत-पाकिस्तान के बंटवारे से पहले 11 अगस्त 1947 को कलात के खान मीर अहमद यार खान ने बलूचिस्तान को स्वतंत्र देश घोषित कर दिया, लेकिन उसकी ये महज 227 दिनों तक ही चली क्योंकि पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री जिन्ना के आदेश पर 28 मार्च 1948 को पाकिस्तानी सेना ने कलात पर कब्जा कर लिया और खान से जबरन विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर करा लिए। कहा जाता है कि, जिन्ना ने खुद अंग्रेजों के सामने कलात की स्वतंत्रता के लिए लड़ाई लड़ी थी और फिर खुद ही इसे पाकिस्तान में मिला लिया।
कई बार हो चुका है विद्रोह
बलूच के लोग इसे विश्वासघात मानते हैं और तब से ही आजादी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। बलूचिस्तान में 1948, 1958-59, 1962-63 और 1973-77 में बड़े पैमाने पर विद्रोह हुए थे। 1970 के दशक में पाकिस्तानी जनरल टिक्का खान ने उनके विद्रोह को क्रूरतापूर्वक दबा दिया था। टिक्का को “बलूचिस्तान का कसाई” कहा जाता है। 1970 की इस लड़ाई में नवाब अकबर खान बुगती, डॉ. अल्लाह नज़र और बलूच मिरी जैसे नेताओं की शहादत हुई थी। मौजूदा समय में बलूचिस्तान में बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) आज़ादी की लड़ाई का सबसे सक्रिय चेहरा है। इसने अपना पहला हिंसक विद्रोह साल 2003 में शुरू किया था।
चीनी परियोजनाओं को बनाया निशाना

इस विद्रोह में बीएलए के लड़ाकों ने पाकिस्तानी सेना, खुफिया केंद्रों और चीनी परियोजनाओं को निशाना बनाया था। इस साल यानी 2025 में BLA ने पाकिस्तान में 51 जगहों पर 71 हमले किए, जिसमें दर्जनों सैनिक मारे गए। इससे पहले इसी साल बीएलए के लड़कों ने पाकिस्तान की ट्रेन जफराबाद एक्सप्रेस को हाई जैक कर लिया था और उसमें सवार सैकड़ों लोगों की हत्या कर दी थी।
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ये है आजादी मांगने की वजह
संसाधनों का शोषण
पाकिस्तान में इस्तेमाल होने वाली आधी से ज्यादा गैस की आपूर्ति बलूचिस्तान से होती है, बावजूद इसके यहां के लोग सुविधाओं से वंचित हैं।
मानवाधिकार उल्लंघन
बलूचिस्तान का आरोप है कि, पाकिस्तानी सेना ने 20,000 बलूच कार्यकर्ताओं को गायब करा दिया है।
सांस्कृतिक दमन
बलूच भाषा और संस्कृति को पंजाबी-प्रधान पाकिस्तानी संस्कृति में दबा दिया गया है।
भारत द्वारा बीते दिनों चलाये गये ‘ऑपरेशन सिन्दूर’ के बीच 9 मई 2025 को बलूच कार्यकर्ता और लेखक मीर यार बलूच ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट शेयर की थी और “बलूचिस्तान गणराज्य” की स्वतंत्रता की घोषणा की थी। इस पोस्ट में उन्होंने भारत और संयुक्त राष्ट्र से मान्यता मांगी थी। साथ ही भारत में एंबेसी खोलने की मांग की थी। हालांकि, पाकिस्तान ने इसे “विदेशी साजिश” करार दिया। वहीं, सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर ने बलूच के खिलाफ कड़ी चेतावनी जारी की। भारत ने मानवाधिकारों के हनन का मुद्दा उठाया, लेकिन घोषणा पर कोई रिएक्शन नहीं दिया।
CPEC: चीन का रणनीतिक निवेश
बलूचिस्तान अब पाकिस्तान से ज़्यादा चीन के लिए युद्ध का मैदान बना हुआ है क्योंकि बलूचिस्तान में ही CPEC (चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा) का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। ये परियोजना साल 2015 में शुरू हुई थी और ड्रैगन ने इसमें 62 बिलियन डॉलर का निवेश किया है। CPEC चीन की बेल्ट एंड रोड पहल का अहम हिस्सा है। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य चीन के झिंजियांग को ग्वादर पोर्ट (बलूचिस्तान) से जोड़ना है। 3,000 किलोमीटर में बना ये गलियारा (CPEC) सड़कों, रेलवे, पाइपलाइनों और ऊर्जा परियोजनाओं का एक जाल है। इसमें ग्वादर पोर्ट, जो कि अरब सागर पर रणनीतिक बंदरगाह है। ऊर्जा परियोजनाएं, कोयला, हाइड्रो और सौर संयंत्र। सड़क-रेल नेटवर्क, जो कराची से पेशावर और खुंजराब तक जाती है। विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ), औद्योगिक विकास के लिए। शामिल हैं।
पाकिस्तान को लाभ
ऊर्जा
CPEC ने 10,400 मेगावाट बिजली जोड़ी, जिससे पाकिस्तान में बिजली की कटौती कम हुई, जैसे थार और पोर्ट कासिम कोयला संयंत्र।
आर्थिक विकास
चीन की परियोजना के तहत बनाई गई सड़कों, रेलवे और SEZ ने 5,000 से अधिक रोजगार पैदा किए।
क्षेत्रीय केंद्र
पाकिस्तान दक्षिण एशिया का व्यापारिक केंद्र बन सकता है।
बुनियादी ढांचा
कराची-पेशावर मोटरवे ने कनेक्टिविटी बढ़ाई।
चीन को लाभ
मलक्का जलडमरूमध्य से सुरक्षा
CPEC तेल और गैस के लिए 12,000 किलोमीटर छोटा रास्ता प्रदान करता है।
रणनीति
ग्वादर और हंबनटोटा (श्रीलंका) से हिंद महासागर में नौसैनिक शक्ति।
आर्थिक लाभ
चीनी कंपनियों को परियोजनाओं से लाभ होता है।
हालांकि, पाकिस्तान के कुल ऋण का एक तिहाई हिस्सा चीन का है, जिससे ऋण जाल बढ़ता जा रहा है। बलूच CPEC को “आधुनिक उपनिवेशवाद” मानते हैं क्योंकि उन्हें इसका लाभ नहीं मिला। इससे उन्हें नौकरी या संसाधन जैसी चीजें नहीं मिल रही हैं।
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भारत पर प्रभाव
CPEC भारत के सामने कई तरह की नई चुनैतियां पेश करता है।
संप्रभुता
दरअसल, ये गिलगित-बाल्टिस्तान यानी के पाक अधिकृत कश्मीर से हो कर गुजरता है। भारत इस क्षेत्र को अपना अभिन्न अंग मानता है। भारत ने CPEC को कभी भी स्वीकृति नहीं दी।
रणनीतिक खतरा
ग्वादर पोर्ट चीन की नेवी को हिंद महासागर तक पहुंच बनाने की सुविधा देता है।
आर्थिक असंतुलन
अगर पाकिस्तान आर्थिक तौर पर मजबूत होता है, तो क्षेत्रीय प्रभाव को कम कर सकता है।
आतंकवाद
बलूचिस्तान में अगर अस्थिरता जैसी स्थिति उत्पन्न होती है, तो भारत में आतंकवादी गतिविधियां और अधिक बढ़ सकती हैं।
कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि, अगर भारत-पाक संबंध बेहतर होते हैं, तो CPEC भारत को मध्य एशिया में व्यापार के बेहतर अवसर प्रदान कर सकता है। भारत ने ईरान में चाबहार पोर्ट और प्रोजेक्ट मौसम शुरू किया है।
हजारों बलूच हुए विस्थापित
बलूच के लोग CPEC परियोजना से अंसतुष्ट हैं क्योंकि इस प्रोजेक्ट की वजह से हजारों बलूचों को विस्थापन का दर्द झेलना पड़ा। बावजूद इसके यहां के लोगों के इस परियोजना के तहत कोई रोजगार नहीं दिया गया। यहां चीनी और पंजाबी श्रमिकों को नौकरी मिली। इस प्रोजेक्ट के कारण बलूच पहचान और जनसांख्यिकी भी खतरे में है। बलूचों के लिए उनकी धरती पर चीनी निवेश उपनिवेशवाद की आहट दिखाई दे रही है। यही सब वजह है कि वे लगातार इसका विरोध कर रहे हैं।
बीएलए का विरोध

2018 में बलूच विद्रोहियों में कराची स्थित चीनी वाणिज्य दूतावास पर हमला किया। इसके बाद 2022 में चीनी यात्रियों की गाड़ी पर अटैक किया।
2025 में ग्वादर पोर्ट पर हमला किया। इन हमलों को देखते हुए चीन ने 2025 में CPEC की सुरक्षा बढ़ाते हुए 60 निजी सुरक्षा कर्मियों को तैनात कर दिया। ये सुरक्षा कर्मी डेवे सिक्योरिटी, चीन ओवरसीज सिक्योरिटी और हुआक्सिन झोंगशान जैसी कंपनियों से जुड़े हैं।
ड्रैगन ने की भारत को घेरने की कोशिश
कुल मिलकर इतना कहा जा सकता है कि, बलूचिस्तान न सिर्फ पाकिस्तान का एक प्रांत है, बल्कि ये चीन की रणनीति का सबसे अहम केंद्र हैं। हाल ही में भारत द्वारा पाकिस्तान के खिलाफ चलाये गये सैन्य अभियान ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान भी ड्रैगन ने पाकिस्तान को सैन्य तकनीक और संसाधन उपलब्ध कराकर भारत को घेरने की कोशिश की थी, लेकिन इस खेल में बलूचिस्तान की आम जनता कुचली जा रही है। बलूच के लोगों को आजादी कब मिलेगी? मिलेगी भी या नहीं? ये समय के गर्भ में है, लेकिन इतना साफ़ है कि बलूचिस्तान दक्षिण एशिया की भू-राजनीति का अहम हिस्सा है, जिसका भारत पर गहरा असर पड़ता है। इस इलाके में कुछ ही होगा तो भारत इससे प्रभावित जरूर होगा।
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