
इस्लामाबाद। Pakistan Defense Budget: एक तरफ तो पाकिस्तान गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है, यहां खाने के लाले पड़े हैं, महंगाई आसमान छू रही है, तो वहीं दूसरी तरफ इसने वित्त वर्ष 2025 -26 के लिए अपने रक्षा बजट में 18 फीसदी की बढ़ोतरी कर दी है। इस बढ़ोतरी के साथ ही देश में सरकार की आर्थिक नीतियों को लेकर तीखी बहस छिड़ गई है। जी हां, पाकिस्तानी सरकार ने इस वर्ष का रक्षा बजट 2.122 ट्रिलियन पाकिस्तानी रुपये (लगभग 7.6 अरब डॉलर) निर्धारित किया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में काफी अधिक है।
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आसमान छू रही महंगाई

रक्षा बजट बढ़ाने के पीछे पाकिस्तान का तर्क है कि, सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए यह कदम उठाना आवश्यक हो गया था। वहीं, अर्थशास्त्रियों और विपक्षी नेताओं का कहना है कि, जब देश विदेशी कर्ज में डूबा हो, महंगाई आसमान छू रही हो और बेरोजगारी चरम पर हो, तो ऐसे में रक्षा बजट बढ़ाने की बजाय सरकार को शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे जैसे क्षेत्रों की स्थिति सुधारने पर ध्यान देना चाहिए।
कर्ज चुकाना हो रहा मुश्किल
गौरतलब है कि, पाकिस्तान बीते कई सालों से गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है। देश में महंगाई 30 फीसदी से ऊपर पहुंच गई है। नतीजतन, आम आदमी का जीना मुश्किल हो गया है। लोगों के पास आटा, दाल खरीदने के भी पैसे नहीं हैं। विदेशी मुद्रा भंडार घटकर करीब 9 अरब डॉलर रह गया है, जो कुछ हफ्तों के आयात के लिए ही काफी है। पाकिस्तानी रुपये में लगातार गिरावट आ रही है, जिससे विदेशी कर्ज चुकाना और भी मुश्किल हो रहा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से 3 अरब डॉलर के बेलआउट पैकेज की उम्मीद है, लेकिन इसके लिए आईएमएफ ने पाकिस्तानी सरकार के सामने कुछ सख्त शर्तें रखी हैं। ऐसे में पाकिस्तान सरकार का रक्षा बजट बढ़ाने का फैसला न तो यहां की जनता को पसंद आया रहा है और न ही विपक्ष को। अर्थशास्त्री भी इसे सवालिया नजर से देख रहे हैं।
सरकार ने दिया ये तर्क

वहीं, पाकिस्तानी सरकार और सेना प्रमुखों का कहना है कि, भारत के साथ तनाव और सीमा पर हो रही घुसपैठ की घटनाओं को देखते ही ये फैसला लेना जरूरी हो गया था। देश को सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए रक्षा बजट में इजाफा करना आवश्यक था। बता दें कि, हाल ही भारत-पाकिस्तान के बीच का तनाव चरम पर पहुंच गया था। ऐसे में पाकिस्तान को अब भारत से खतरा महसूस हो रहा है। यही वजह है कि, यहां की शाहबाज सरकार और जनरल असीम मुनीर ने सेना को मजबूत करने का फैसला लिया है, जिसके लिए ज्यादा पैसे की जरूरत है।
देश पर पड़ेगा आर्थिक दबाव
आंतरिक सुरक्षा खतरों, खासकर बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में आतंकवादी गतिविधियों को रोकने के लिए सेना को ज्यादा से ज्यादा संसाधनों की जरूरत है। इसके अलावा चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) जैसी परियोजनाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए भी अतिरिक्त फंड की जरूरत है। हालांकि, एक्सपर्ट्स का कहना है कि, सेना पर ज्यादा पैसे खर्च करने से देश की अर्थव्यवस्था पर और दबाव पड़ेगा, जिसका खामियाजा यहां की जनता को भुगतना पड़ेगा।
आईएमएफ़ ने रखी शर्त

हालांकि, पाकिस्तान की सरकार और सेना का ये तर्क किसी के गले के नीचे नहीं उतर रहा है। पाकिस्तान के अर्थशास्त्रियों, विपक्षी नेताओं और मानवाधिकार संगठनों ने इस फ़ैसले की कड़ी निंदा की है। पाकिस्तानी अर्थशास्त्री डॉ. अहसान इक़बाल कहते हैं, सेना पर ख़र्च बढ़ाने के बजाय लोगों की मूलभूत सुविधाओं पर ध्यान दिया जाना चाहिए।” पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ (पीटीआई) के नेता ने सवाल उठाया है कि, आईएमएफ़ से मदद मांगने वाला देश अपना रक्षा बजट कैसे बढ़ा सकता है?” मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का आरोप है कि, पाकिस्तानी सेना पहले ही देश के बजट का एक बड़ा हिस्सा खा रही है, जबकि जनता भूख से मर रही है।”
बेलआउट पैकेज की उम्मीद
बता दें कि, पाकिस्तान आईएमएफ से 3 बिलियन डॉलर के बेलआउट पैकेज की उम्मीद लगाये बैठा है, लेकिन आईएमएफ ने ये फंड देने से पहले कड़ी शर्तें रख दी हैं, जिनमें सब्सिडी में कमी (ख़ास तौर पर बिजली और ईंधन पर), कर सुधार और नए करों की शुरूआत, सरकारी ख़र्च में कमी आदि शामिल है। ऐसे में पाकिस्तान यदि इन शर्तों को पूरा नहीं करता है, तो उसे आईएमएफ से मदद मिलना मुश्किल हो जाएगा और अगर ऐसा हुआ तो देश का आर्थिक संकट और भी ज्यादा गहरा जायेगा।
विनाशाकारी स्थिति में धकेल सकता है पाकिस्तान को

रक्षा बजट बढ़ाने का पाकिस्तान का फ़ैसला उसकी सुरक्षा चिंताओं को दर्शाता है, साथ ही ये भी सोचने के लिए मजबूर करता है कि, क्या देश अपनी आर्थिक प्राथमिकताओं को सही तरीक़े से तय कर पा रहा है? जब देश में गंभीर आर्थिक संकट है तो सेना बजट बढ़ाना जरूरी था। शायद नहीं, तब तक, जब तक कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं हो जाती, सेना पर अत्यधिक खर्च आने वाले समय में देश को विनाशाकारी स्थिति में ले जा सकता है।
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