
War in World: 21वीं सदी महान विचारों का नहीं, बल्कि अन्याय, सैन्यवाद और साम्राज्यवाद के नए रूपों का युग बनती जा रही है। अमेरिका जैसे देश अब खुलेआम अपना आर्थिक एजेंडा अन्य देशों पर थोप रहे हैं। ये सदी अब पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो गई है। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय नीति-निर्माताओं और रणनीतिकारों द्वारा गढ़ी गई कहानी यह स्पष्ट हो चुका है कि ये युग विचारों का नहीं बल्कि हथियारों का है। अब मामले शांति से नहीं बल्कि युद्ध से हल किये जा रहे हैं।
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1991 में शुरू हुई थी वैश्वीकरण लहर

उल्लेखनीय है कि 1991 में जब वैश्वीकरण और उदारीकरण की लहर शुरू हुई था, तब कहा जा रहा था कि, अब दुनिया की साम्राज्यवादी शक्तियों को अपनी सेना भेजकर किसी देश पर कब्ज़ा करने की ज़रूरत नहीं है। वे पूंजी और तकनीक के बल पर एशिया और अफ्रीका के हाल ही में आज़ाद हुए देशों को नियंत्रित करने के लिए एक नया हथकंडा अपना रहे हैं, लेकिन अब इस रणनीति ने अपनी सीमाएं पहचान ली हैं। कनाडा के दार्शनिक जॉन राल्स्टन सॉल ने दो दशक पहले स्पष्ट कहा था कि, वैश्वीकरण ध्वस्त हो गया है, क्योंकि इसे उसके वास्तविक स्वरूप में लागू नहीं किया जा रहा है।
कमजोर हुईं अमेरिका की आर्थिक नीतियां
हालांकि उस वक्त उन नीतियों के आलोचकों ने ऐसा कहा था और अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देश, जिन्होंने रीगनॉमिक्स और थैचरनॉमिक्स के ज़रिए उन नीतियों को लागू किया था, इसकी घोषणा नहीं कर रहे थे, लेकिन आज अमेरिका ‘मैगा’ (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) अभियान के ज़रिए वैश्वीकरण को उलटने का खुलेआम ऐलान कर रहा था। इसकी वजह साफ़ है कि, कुछ हद तक उन नीतियों का लाभ एशिया और अफ़्रीका के देशों को हुआ और वे आर्थिक शक्ति के रूप में उभरने लगे। वहीं अमेरिका और यूरोप की आर्थिक शक्तियां कमज़ोर हो गईं, लेकिन ध्यान रहे वित्तीय वैश्वीकरण के अंत की यह घोषणा दुनिया में किसी श्रेष्ठ किस्म के शुद्ध राष्ट्रवाद के उदय का संकेत नहीं है।
भविष्य को लेकर आशंकाएं
बल्कि, यह भौतिक साम्राज्यवाद की वापसी है। ज़ाहिर है, वह साम्राज्यवाद शक्तिशाली देशों द्वारा दूर-दराज के देशों में सैन्य अड्डे बनाने और नए किस्म के कृत्रिम बुद्धि (एआई) से संचालित हथियारों से सुरक्षित होने का होगा। यह सभी संप्रभु देशों की नीतिगत स्वायत्तता से नाराज़ महाशक्तियों का शासन होगा, जो तख्तापलट करके वहां कठपुतली सरकारें स्थापित करेंगी। दुनिया में हथियारों के महिमामंडन और उनके परीक्षण का सिलसिला तेज़ हो गया है। अगर यूरोप में रूस और यूक्रेन के बीच ऐसा हो रहा है, तो पश्चिम एशिया में इज़राइल-फ़िलिस्तीन और ईरान के बीच भी ऐसा होता रहा है। दक्षिण एशिया में भारत-पाकिस्तान और चीन के बीच भी ऐसा हो रहा है। इन प्रयोगों के दौरान लाखों लोग मारे जा चुके हैं और भविष्य को लेकर गंभीर आशंकाएं बनी हुई हैं।
हथियारों के खिलाफ चलनी चाहिए मुहिम

इस माहौल में ऐसे विचारकों, बुद्धिजीवियों और राजनेताओं की ज़रूरत है, जो अन्याय, हथियारों और युद्ध के ख़िलाफ़ अपनी मुहिम तेज़ करें। साथ ही, उन नेताओं की अहमियत भी समझें जो पिछली सदी में परमाणु बम का विरोध कर रहे थे और युद्ध-विरोधी माहौल बना रहे थे। यह विडंबना ही है कि जो लोग ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान को सबक नहीं सिखा पाए, वे अब 1947 के कबायली हमलों और 1962 के चीनी हमलों में भारत को हुए नुकसान के लिए पंडित जवाहरलाल नेहरू को ज़िम्मेदार ठहराकर अपनी वाहवाही कर रहे हैं। दरअसल, गांधी के सत्याग्रह से आज़ादी पाने वाले भारत के पहले प्रधानमंत्री नेहरू एक शांतिप्रिय और परमाणु बम-मुक्त दुनिया की तलाश में थे। उनकी इसी सोच के कारण उन्हें भारतीय ज़मीन का नुकसान उठाना पड़ा, लेकिन इसी के दम पर वे भारत को आर्थिक विकास के रास्ते पर ला पाए। आज जब हम इक्कीसवीं सदी में पीछे मुड़कर देखते हैं, तो महसूस होता है कि दुनिया को हथियारों के ख़िलाफ़ उस मुहिम की कितनी ज़रूरत है।
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परमाणु हथियारों के ख़िलाफ़ किया गया था आगाह
नेहरू परमाणु-विरोधी अभियान में किस तरह शामिल थे, इसका ज़िक्र ख़ुद उनके राजनीतिक प्रतिद्वंदी डॉ. राम मनोहर लोहिया ने किया था। नेहरू ने लोहिया की बातों को लगभग नए संदर्भ में रखते हुए कहा था कि हां, एक नेता समझौता करता है, झुकता है, मिलावट करता है, एक पैगम्बर को झुकने की ज़रूरत नहीं होती। वह अपने आदर्शों के साथ आगे बढ़ता रहता है। ………उनके समय में सिर्फ़ एक ही व्यक्ति हुआ है जिसने नेतृत्व और पैगम्बरी, दोनों को मिलाकर काम किया और वह थे महात्मा गांधी।
कोई भी देश जो नेतृत्व करेगा और एकतरफ़ा हथियारों को ख़त्म कर देगा, वह कभी नहीं हारेगा, उसकी ताकत और हिम्मत बढ़ेगी, लेकिन यह काम कौन करवाएगा? यह वही कर सकता है जो न सिर्फ़ नेता हो बल्कि पैगम्बर भी हो, इसे तो कोई महात्मा ही करवा सकता है और महात्मा गांधी कहाँ से मिलेंगे? दरअसल, नेहरू उस परमाणु-विरोधी अभियान से जुड़े थे जिसकी शुरुआत प्रसिद्ध बुद्धिजीवी बर्ट्रेंड रसेल और अल्बर्ट आइंस्टीन ने 1955 में की थी। इसे रसेल-आइंस्टीन घोषणापत्र के नाम से जाना जाता है। इस घोषणापत्र में विश्व के नेताओं को परमाणु हथियारों के ख़िलाफ़ आगाह किया गया था और समस्याओं के शांतिपूर्ण समाधान की बात की गई थी।
कभी नहीं हुआ खुला युद्ध

समस्या यह है कि आज दुनिया ने परमाणु हथियारों को शांति की कसौटी बना लिया है। तर्क यह है कि जिन देशों के पास परमाणु हथियार हैं, उनके बीच कभी खुला युद्ध नहीं होगा क्योंकि दोनों देश व्यापक विनाश से बचना चाहेंगे। इसी सिद्धांत को आगे बढ़ाते हुए परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) और व्यापक परमाणु परीक्षण विरोधी संधि हुई है, जिसमें दुनिया के लगभग 190 देश भागीदार हैं। लेकिन ये संधियां एक ओर पक्षपातपूर्ण हैं और दूसरी ओर इनका प्रभाव भी अधूरा है। अगर परमाणु प्रसार न होता, तो न तो पाकिस्तान और न ही इज़राइल परमाणु बम बना पाते।
दुनिया का विनाश करेंगे परमाणु हथियार
हालांकि, परीक्षण के लिए प्रयोगशाला पद्धति शुरू हो गई है, लेकिन पिछली सदी में चीन पर कई परीक्षण करने का संदेह था, लेकिन असली सवाल यह है कि, दुनिया में परमाणु हथियारों पर नियंत्रण की विकसित व्यवस्था मौजूद होने के बावजूद, इराक को परमाणु हथियार रखने के झूठे आरोप में क्यों तबाह कर दिया गया और ईरान पर यूरेनियम संवर्धन के बहाने हमला क्यों किया गया? दरअसल, परमाणु हथियार जब बनेंगे तब विनाश करेंगे, लेकिन उससे पहले ही मिसाइलों और ड्रोन से हुए युद्धों ने दुनिया में लाखों लोगों की जान ले ली है। रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध में मरने वालों की संख्या दो लाख को पार कर रही है। जबकि इज़राइल ने गाजा में 60-70 हज़ार लोगों को मार डाला है। दरअसल, गाजा हमले को नरसंहार कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
डॉ.लोहिया ने जाहिर की थी आशंका
ऐसे में डॉ. लोहिया का वह सिद्धांत, जिसमें वे न केवल परमाणु हथियारों, बल्कि सभी प्रकार के हथियारों को खत्म करने की बात करते हैं, प्रासंगिक है। डॉ. लोहिया 23 जून 1962 को नैनीताल में दिए गए अपने प्रसिद्ध व्याख्यान ‘दरवाजों के कर्तव्य’ में कहते हैं कि ‘दरअसल, सवाल इन छोटे हथियारों या पारंपरिक हथियारों को खत्म करने का भी है। मेरे मन में कोई संदेह नहीं है कि हथियारों के खात्मे का मतलब सिर्फ़ परमाणु बमों का खात्मा नहीं है, बल्कि इन पारंपरिक हथियारों का भी खात्मा है। इन्हें कैसे खत्म किया जाएगा? दुनिया कब इतनी अच्छी होगी कि बंदूकों और लाठियों की ज़रूरत ही न रहे?

डॉ. लोहिया इन प्रश्नों पर गहन चिंतन करते हैं। इस चिंतन के दौरान, वे शस्त्रों की परिभाषा भी देते हैं। वे कहते हैं, “वास्तव में, शस्त्र का अर्थ अन्याय है। शस्त्र या तो अन्याय को समाप्त करने का साधन हैं या उसे कम करने का। यदि समाज में किसी प्रकार से अन्याय समाप्त हो सकता है, तो शस्त्रों की कोई आवश्यकता नहीं है। शस्त्रों की आवश्यकता अन्याय से जुड़ी है।” उनकी परिभाषा में यह निहित है कि शस्त्र भी अन्याय के उपकरण हैं। यदि शस्त्र न होते, तो एक व्यक्ति दूसरे पर उतना अन्याय नहीं कर पाता, या एक देश दूसरे देश पर उतना प्रभुत्व नहीं जमा पाता, जितना आज कर रहा है। इसलिए, जब शस्त्र नहीं होंगे, तो अन्याय भी समाप्त हो जाएगा। इसके बजाय, वे कहते हैं कि जब दुनिया से अन्याय समाप्त हो जाएगा, तो शस्त्रों की आवश्यकता भी समाप्त हो जाएगी। तब केवल लाठी-डंडे ही होंगे और उनका प्रयोग भी न्यूनतम होगा।
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