
नई दिल्ली। PM Modi France Visit: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन दिनों फ्रांस की तीन दिवसीय यात्रा पर हैं। वह सोमवार को पेरिस पहुंचे थे, जहां भारतीय समुदाय के लोगों ने उनका भव्य अभिवादन किया। इसके बाद फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने पेरिस के एलिसी पैलेस में उनके स्वागत में आयोजित रात्रिभोज में गले लगाकर उनका स्वागत किया। रात्रिभोज के दौरान ही प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिकी उप राष्ट्रपति जेडी वेंस से भी मुलाकात की। दरअसल, वेंस भी एआई शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए फ्रांस की यात्रा पर हैं।
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शिखर सम्मेलन में लिया हिस्सा

आज मंगलवार को पीएम मोदी का फ़्रांस में दूसरा दिन था। आज उन्होंने फ्रांस के राष्ट्रपति के साथ एआई शिखर सम्मेलन में हिस्सा लिया। साथ ही ‘एआई एक्शन समिट’ की सह-अध्यक्षता की। इसके बाद मोदी और मैक्रो ने द्विपक्षीय वार्ता की। फ़्रांस यात्रा की तीसरे और आखिरी दिन यानी बुधवार को प्रधानमंत्री मोदी मार्सिले जाएंगे। यहां वे प्रथम विश्व युद्ध में शहीद हुए तमाम भारतीय सैनिकों को श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे। इसके बाद वे फ्रांस के राष्ट्रपति राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के साथ मजारग्यूस युद्ध कब्रिस्तान भी जाएंगे। तत्पश्चात प्रधानमंत्री मोदी और मैक्रों मार्सिले में ही भारत के नए महावाणिज्य दूतावास का उद्घाटन करेंगे।
मार्सिले में ही गिरफ्तारी से भागने की कोशिश की थी सावरकर ने

पीएम मोदी अपनी मार्सिले के इस यात्रा के दौरान पेरिस के बाहर प्रमुख सहयोगियों के साथ राजनयिक शिखर सम्मेलन भी आयोजित करेंगे। जैसा उन्होंने पिछली साल अपनी जयपुर यात्रा के दौरान किया था। आपको बता दें कि मार्सिले बंदरगाह शहर का नाता भारत के उस महान स्वतंत्रता संग्राम से है जिसने अपनी पूरी जिन्दगी देश की आजादी के लिए सौंप दी और वर्षों तक काला पानी की सजा काटी। इस महान स्वतंत्रता सेनानी का नाम विनायक दामोदर सावरकर है। इतिहास के पन्नों में दर्ज रिकार्ड के मुताबिक, मार्सिले वहीं जगह है जहां से सवारकर ने ब्रिटिश हुकूमत की गिरफ्तारी से बचाकर भागने की कोशिश की थी।
समुद्र में लगा दी थी छलांग

बताया जाता है कि सावरकर को गिरफ्तार करने के बाद जब ब्रिटिश हुकूमत पेशी के लिए उन्हें भारत ले जा रही थी, तब 8 जुलाई, 1910 को उन्होंने ब्रिटिश जहाज मोरिया से समुद्र में छलांग लगा दी थी और भगाने की कोशिश की थी। हालांकि, वह अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सके और जब वे समंदर से तैरकर किनारे पहुंचे तो उन्हें फ्रेंच अफसरों ने दोबारा से गिरफ्तार कर लिया और फिर फ्रांसीसी अधिकारियों ने उन्हें वापस उसी जहाज पर अंग्रेजों को सौंप दिया था। हालांकि, सावरकर के भागने की कोशिशों और उन्हें पकड़कर ब्रिटिश हुकूमत के हवाले कर देने से फ्रांस और ब्रिटेन के बीच कूटनीतिक तनाव पैदा हो गया था। फ्रांस का आरोप था कि स्वतंत्रता सेनानी की वापसी “अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन” है, क्योंकि इसके लिए उचित प्रत्यर्पण प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया था। इस विवाद के बाद इस पूरे मामले को स्थायी मध्यस्थता न्यायालय में पेश किया गया था। इस मामले में साल 1911 में फैसला आया कि सावरकर की गिरफ्तारी में अनियमितता बरती गई थी। बावजूद इसके ब्रिटेन ने उन्हें फ्रांस को नहीं सौंपा।
कौन थे सावरकर
वीर सावरकर का नाम भारत के महान स्वतंत्रता सेनानियों में लिया जाता है। उन्होंने देश में जाति व्यवस्था के उन्मूलन का समर्थन किया था। वे न सिर्फ स्वतंत्रता सेनानी थे बल्कि एक राजनेता, कार्यकर्ता और लेखक भी थे। सावरकर ने अपने जीवनकाल में एक साथ का भूमिकाओं का निर्वहन किया। कहा जाता है कि साल 1922 में रत्नागिरी में हिरासत में रहने के दौरान उन्होंने हिंदुत्व की हिंदू राष्ट्रवादी राजनीतिक विचारधारा को विकसित करने का काम किया था। वे हिंदू महासभा में अग्रणी व्यक्तियों में से एक थे। उनके हिन्दुत्ववादी विचारधारा से ही प्रेरित होकर ही उनके अनुयायियों ने उनके नाम में ‘वीर’ (जिसका अर्थ है बहादुर) जोड़ दिया।
विवादों भरा रहा जीवन
हालांकि सावरकर के जीवन को लेकर कई विवाद है। खासकर भारत के मौजूदा राजनीतिक माहौल में। देश का कुछ वर्ग उन्हें स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा नहीं देता है लेकिन इतिहास के पन्नों पर गौर करें तो सावरकर को अंग्रेजों ने लगभग 50 साल तक जेल में बंद रखा था। उन्हें सेलुलर जेल, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में कैद रखा गया था। अपने संघर्ष के दिनों में वीर सावरकर ने कई नारे दिए थे, जिनमें से एक नारा काफी प्रसिद्ध हुआ था। उनका सबसे प्रसिद्ध नारा था “सभी राजनीति का हिंदूकरण करें और हिंदू धर्म का सैन्यीकरण करें”। जेल में ही वीर सावरकर ने एक वैचारिक किताब लिखी थी, जिसे हिंदुत्व का नाम दिया गया था: हिंदू कौन है?’
वीर सावरकर का जन्म और प्रारंभिक जीवन

महाराष्ट्र के नासिक शहर के समीप स्थित भगूर गांव में साल 28 मई 1883 को वीर सावरकर का जन्म एक मराठी हिंदू चितपावन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम दामोदर सावरकर और माता का नाम राधाबाई सावरकर था। सावरकर ने हाई स्कूल में पढ़ाई के दौरान ही देश की आजादी के लिए हो रहे आंदोलनों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया था। इसके बाद साल 1903 में उन्होंने अपने बड़े भाई गणेश सावरकर के साथ मित्र मेला की स्थापना की, जिसे साल 1906 में अभिनव भारत सोसाइटी का नाम दिया गया। इस संस्था का मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकना और हिंदू गौरव को पुनर्जीवित करना था।
स्वतंत्रता संग्राम से कैसे हुआ जुड़ाव
कहा जाता है कि वीर सावरकर पर बाल गंगाधर तिलक का सबसे ज्यादा प्रभाव था। वहीं तिलक भी सावरकर से खूब प्रभावित हुए। तिलक ने ही 1906 में उनकी कानून की पढ़ाई के लिए लंदन में शिवाजी छात्रवृत्ति प्राप्त करने में उनकी सहायता की थी। दरअसल, सावरकर ने साल 1905 के बंगाल विभाजन के विरोध में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था और तिलक की उपस्थिति में अन्य छात्रों के साथ भारत में विदेशी कपड़ों की होली जलाई।इसके बाद साल 1909 के आसपास ब्रिटिश सरकार ने सावरकर पर सरकार के खिलाफ साजिश रचने का आरोप लगाया गया। साथ ही ये आरोप भी लगाया कि उन्होंने कई अधिकारियों की हत्या की थी। ऐसे में गिरफ्तारी से बचने के लिए सावरकर पेरिस चले गए, लेकिन बाद में वे लंदन वापस लौट आए। इसके बाद मार्च 1910 में सावरकर को लंदन में हथियार वितरण, राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ने और देशद्रोही भाषण देने जैसे कई संगीन आरोपों में गिरफ्तार कर लिया गया। वीर सावरकर ने भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया और हिंदू सभाओं को अपने पदों पर बने रहने कहा था और आंदोलन में हर कीमत पर दूरी बनाने को कहा था।
त्याग दिया था अन्न, जल और दवा

कहा जाता कि सावरकर ने अपनी पत्नी यमुनाबाई के निधन के बाद भोजन, पानी और दवा तक का त्याग कर दिया था जिससे 26 फरवरी 1966 को मुंबई में उनका निधन हो गया। उन्होंने अपनी मौत से पहले एक लेख लिखा जिसका शीर्षक था “आत्महत्या नहीं आत्मर्पण”। इसे लेख में उन्होंने तर्क दिया कि जब किसी के जीवन का उद्देश्य समाप्त हो जाता है और उसमें समाज की सेवा करने की क्षमता नहीं रह जाती है, तो उसे जीवन को समाप्त कर देना ही बेहतर होता है। उसे मृत्यु का इंतजार नहीं करना चाहिए।
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