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Trump VS Greenland: अमेरिका के लिए क्यों जरूरी है ग्रीनलैंड?, बार-बार जताता है खरीदने की इच्छा

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Donald Trump VS Greenland:

नई दिल्ली। Trump VS Greenland: व्हाइट हाउस में अमेरिका की नई सरकार अपनी महत्वाकांक्षाओं का खुलकर इजहार कर रही है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को खरीदने की बात कही है। हालांकि, वहां की जनता ने इस पर नाराजगी जताई है, लेकिन ट्रंप प्रशासन अपने बयान पर कायम है। हाल ही में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने ग्रीनलैंड का दौरा किया, जिससे यह बात और मजबूत हो गई।

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अलग-अलग बयान दे रहे पुतिन

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इस बीच रूस के राष्ट्रपति और ट्रंप के नए दोस्त व्लादिमीर पुतिन ने भी अमेरिका की मंशा को लेकर कुछ ऐसा कहा, जो व्हाइट हाउस के पक्ष में है। ऐसे में सवाल खड़ा हो रहा है कि, क्या पुतिन नई दोस्ती को मजबूत करने के लिए ऐसा कह रहे हैं या फिर ग्रीनलैंड और रूस के बीच कुछ तनाव था, जिसे दूर करने के लिए उन्होंने अलग-अलग बयान देना शुरू किया?

 19वीं सदी से ग्रीनलैंड खरीदना चाह रहा अमेरिका

आर्कटिक सर्कल के सबसे बड़े शहर मरमंस्क में भाषण देते हुए पुतिन ने कहा- अगर नए अमेरिकी प्रशासन के बयान को बेतुका माना जाए तो यह बहुत बड़ी गलती होगी। ऐसा कुछ नहीं है। अमेरिका 19वीं सदी से ही ऐसा चाहता रहा है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद भी उसने डेनमार्क से ग्रीनलैंड खरीदने की कोशिश की थी। अमेरिका के पास ग्रीनलैंड को लेकर बड़ी योजनाएं हैं, जिसकी जड़ें ऐतिहासिक हैं।

बढ़ाएंगे सैन्य ताकत

यह स्वाभाविक है कि, आर्कटिक में उसकी भौगोलिक, रणनीतिक और आर्थिक दिलचस्पी है। अब तक आर्कटिक में सबसे मजबूत देश वो रहा। पुतिन अपने भाषण में यह साफ करना नहीं भूले कि ,भले ही वह आर्कटिक में किसी को उकसा नहीं रहे हैं, लेकिन वह इस पर नजर बनाए हुए हैं और जरूरत पड़ने पर वह अपनी सैन्य ताकत भी बढ़ाएंगे।

प्राकृतिक संसाधनों का लाभ

पुतिन ने ग्रीनलैंड को लेकर जिस तरह से अमेरिका के पक्ष में खड़े हैं, उससे साफ लग रहा है कि वे, दो नावों पर सवार हैं। एक तरफ वे ट्रंप से अपनी दोस्ती बनाए रखने के लिए ग्रीनलैंड के विचार का समर्थन कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ उन्हें डर है कि, कहीं आर्कटिक में रूस अपनी ताकत न खो दे। दूसरा पहलू यह है कि, रूस चाहता है कि अमेरिका उसके साथ पूरे आर्कटिक में निवेश करे ताकि उसे प्राकृतिक संसाधनों का लाभ मिल सके।

रूस ने किया है भारी सैन्य निवेश

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रूसी प्रत्यक्ष निवेश कोष के मुख्य अधिकारी दिमित्रिव का कहना है कि, वे बर्फीले क्षेत्र में संयुक्त निवेश चाहते हैं। ग्रीनलैंड का दो तिहाई हिस्सा आर्कटिक में आता है और यह वह क्षेत्र है जिसे रूस रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानता है। वीओए को दिए साक्षात्कार में डेनमार्क के एक विश्लेषक ने कहा, रूसी मिसाइलों के अमेरिका पहुंचने का सबसे छोटा रास्ता ग्रीनलैंड से होकर जाता है। रूस ने शीत युद्ध के समय से ही इस क्षेत्र में भारी सैन्य निवेश किया है।

सामरिक दृष्टि से मजबूत

बता दें कि रूस के पास इस समय दुनिया का सबसे लंबा आर्कटिक तट है, जो उसकी उत्तरी सीमा से होकर गुजरता है। इसे संभालने के लिए मॉस्को ने वहां बेहद आधुनिक सैन्य अड्डा बनाया है। इसके अलावा उसके पास 40 से ज्यादा आइसब्रेकर जहाज हैं, जो युद्ध की स्थिति में काम आ सकते हैं। कुल मिलाकर सामरिक दृष्टि से रूस यहां सबसे अधिक ताकत के साथ मौजूद है।

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मास्को पर लगता है जासूसी का आरोप

हालांकि, ग्रीनलैंड में इसकी कोई आधिकारिक मौजूदगी नहीं है, लेकिन इस पर कई बार यहां खुफिया गतिविधियां होने का आरोप लग चुका है। जैसे, 2019 में डेनमार्क ने मॉस्को पर अपनी खुफिया एजेंसी के जरिए ग्रीनलैंड में जासूसी मिशन चलाने का आरोप लगाया था। रूस के कई वैज्ञानिक दल शोध के लिए ग्रीनलैंड आते रहते हैं और यह इस संदेह से भी घिरा रहा है कि यह जासूसी या सैन्य सर्वेक्षण का कोई तरीका हो सकता है।

मौजूद है अमेरिकी एयरबेस

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ग्रीनलैंड अमेरिका का विरोध कर रहा है, लेकिन दूसरे विश्व युद्ध के समय से ही वहां एक अमेरिकी एयरबेस मौजूद है। इसके अलावा अमेरिका आर्कटिक काउंसिल का सदस्य है और वहां उसके कुछ समुद्री इलाके भी हैं। आर्कटिक में इसका सबसे बड़ा राज्य अलास्का है। आर्कटिक और उत्तरी अटलांटिक महासागरों के बीच स्थित इस द्वीप की खोज 10वीं सदी में हुई थी जिसके बाद यहां यूरोपीय उपनिवेश स्थापित करने की कोशिश की गई, लेकिन वहां के हालात इतने कठिन थे कि कब्जा छोड़ दिया गया। बाद में 14वीं सदी के आसपास यहां डेनमार्क और नॉर्वे का संघ बना जो इस पर संयुक्त रूप से शासन करने लगा।

कच्चा मांस खाते हैं यहां के लोग

क्षेत्रफल की दृष्टि से दुनिया के 12वें सबसे बड़े देश की जनसंख्या करीब 60 हजार है। स्थानीय आबादी को इनुइट कहते हैं, जो डेनिश भाषा बोलते हैं, लेकिन उनकी संस्कृति डेनमार्क से अलग है। बर्फ और चट्टानों से भरे इस देश में पर्यटकों को छोड़कर आय का कोई खास स्रोत नहीं है। इनुइट दुकानदार स्थानीय केक, बर्फ की मछली और बारहसिंगों के सींग से बने शो-पीस बेचकर पैसा कमाते हैं।

मंगोलों से संबंधित इस जनजाति को एस्किमो भी कहा जाता है, जो बेहद ठंडे मौसम में कच्चा मांस खाकर भी जीवित रहती है। 19वीं सदी में डेनमार्क ने इस पर नियंत्रण कर लिया था। अब भी यह व्यवस्था कुछ-कुछ वैसी ही है। ग्रीनलैंड फिलहाल एक स्वायत्त देश है, जो डेनमार्क के अंतर्गत आता है। इसकी अपनी सरकार है, लेकिन प्रमुख मुद्दों, विदेश नीति आदि डेनमार्क की सरकार ही देखती है।

खनिज संपन्न देश है ग्रीनलैंड 

शीत युद्ध के दौरान इसका सामरिक महत्व अचानक उभरकर सामने आया, तब अमेरिका ने यहां अपना एयरबेस बनाया, ताकि वह पड़ोसियों पर आसानी से नजर रख सके। बता दें कि ग्रीनलैंड जहां स्थित है, वहां से अमेरिका रूस, चीन और यहां तक ​​कि उत्तर कोरिया से आने वाली किसी भी मिसाइल गतिविधि पर न सिर्फ नजर रख सकता है, बल्कि उसे रोक भी सकता है। इसी तरह वह यहां से एशिया या यूरोप में मिसाइल भी भेज सकता है। दूसरी वजह यह है कि, ग्रीनलैंड खनिज संपन्न देश है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण जैसे-जैसे आर्कटिक की बर्फ पिघल रही है, यहां खनिजों और ऊर्जा संसाधनों का खनन भी बढ़ रहा है।

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तेजी से पिघल रही आर्कटिक की बर्फ

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यहां वो तमाम खनिज हैं, जिनका इस्तेमाल मोबाइल फोन और इलेक्ट्रिक वाहनों के साथ हथियारों में किया जाता है। फिलहाल, चीन इन खनिजों का बड़ा आपूर्तिकर्ता है। अमेरिका इस लाइन में आगे रहना चाहता है। ग्रीनलैंड के आसपास की बर्फ पिघलने से नए समुद्री व्यापार मार्ग खुल सकते हैं, जिसका असर वैश्विक व्यापार और भू-राजनीतिक संतुलन पर पड़ सकता है। आर्कटिक में तेजी से पिघल रही बर्फ के कारण ग्रीनलैंड के पास से गुजरने वाले समुद्री मार्ग साल में लंबे समय तक खुले रह सकते हैं। ये मार्ग अब तक इस्तेमाल किए जाने वाले व्यापार मार्गों की तुलना में यूरोप और एशिया के बीच की दूरी को काफी हद तक कम कर देंगे।

यूएस ने कब कब जताई ग्रीनलैंड को खरीदने की इच्छा

– 1867 में तत्कालीन एंड्रयू जॉनसन प्रशासन ने ग्रीनलैंड और आइसलैंड दोनों को खरीदने की पेशकश की थी। यह वह समय था जब उसने रूस से अलास्का को बहुत कम कीमत पर खरीदा था। इसी क्रम में उसे उम्मीद थी कि, उसे ये हिस्से भी मिल जाएंगे, लेकिन डेनमार्क ने मना कर दिया।

– 1946 में राष्ट्रपति हैरी एस ट्रूमैन 100 मिलियन डॉलर के बदले ग्रीनलैंड खरीदना चाहते थे। यह द्वितीय विश्व युद्ध के ठीक बाद का समय था। उस वक्त डेनमार्क इतना मजबूत नहीं था। अमेरिका ने उसे सौ मिलियन डॉलर का सोना देने की भी पेशकश की थी, लेकिन वह तब भी राजी नहीं हुआ।

– ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में सार्वजनिक रूप से ग्रीनलैंड को खरीदने की बात कही थी। उन्होंने इसे रियल एस्टेट डील भी कहा था, लेकिन इस बार भी ऐसा नहीं हो सका। नाराज ट्रंप ने अपनी वहां की तय यात्रा रद्द कर दी।

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