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Indo-Pak War: भारत के लिए कितना मुश्किल होगा POK लेना, करना पड़ेगा किन चुनौतियों का सामना, जानें एक्सपर्ट्स से

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Indo-Pak War:
नई दिल्‍ली। Indo-Pak War: जम्मू कश्मीर के पहलगाम में हुए टेरर अटैक के बाद से भारत-पाकिस्तान के बीच तनातनी और बढ़ गई है। ऐसे में दोनों देशों के बीच  युद्ध होना लगभग तय माना जा रहा है। पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत सरकार सख्त रुख अपनाए है। कहा जा रहा है कि, मोदी सरकार ने पाकिस्तान पर हमले की अंतिम तैयारी कर ली है। ऐसे में बड़ा सवाल उठ रहा है कि, क्या पाकिस्तान पर हमले में निशाना पाकिस्तानी सेना होगी या इस बार पीओके को पाकिस्तान के कब्जे से आजाद कराने की कोशिश होगी? और अगर पीओके को कब्जे में लेना होगा तो भारत को कितनी मुश्किल आएगी। आइए जानते हैं।
ऊंचे पहाड़ और ग्लेशियर खड़ी करेंगे मुश्किल

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बता दें कि, पीओके यानी पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर बेहद दुर्गम इलाका है, यह पूरा इलाका ऊंचे पहाड़, ग्लेशियर, गहरी घाटियों और संकरे दर्रे में बसा है। ये भी दावा किया जा रहा है कि, चीन भी पीओके के भारतीय सेना के लिए मुश्किल खड़ी करेगा। दरअसल, चीन ने यहां बंकर बना लिए हैं। पीओके चीन के लिए काफी अहमियत रखता है, क्योंकि सीपीईसी प्रोजेक्ट का बड़ा हिस्सा यहीं से होकर गुजरता है। ऐसे में भारत अगर पीओके की लड़ाई लड़ता है, तो इसके लिए उसे एडवांस रणनीति बनानी होगी और कठिन लड़ाई लड़नी होगी। यहां नीलम घाटी, लीपा घाटी और झेलम कॉरिडोर की लड़ाई आसान नहीं होगी। यहां के दुर्गम पहाड़ी इलाके, ग्लेशियर और पतले दर्रे भारतीय सेना के सामने कई तरह की मुश्किल खड़ी करेंगे।
पीएलए  रोकेगा रास्ता
माना जा रहा है कि, पाकिस्तानी सेना को हमेशा से यह डर रहा है कि, भारत उसके कब्जे से पीओके को आजाद कराने की कोशिश जरूर करेगा। यही कारण है कि, उसने एलओसी के पास बंकर, आर्टिलरी पोजिशन, सारंग-2 मल्टीपल रॉकेट लॉन्चर और कमांड हेडक्वार्टर तैनात कर दिए हैं। इसके अलावा पीओके की लड़ाई लड़ना पाकिस्तानी सेना के लिए घरेलू मैदान की लड़ाई होगी, यानी सप्लाई, गाइडेंस और बैकअप सब उनका ही होगा। वहीं, भारत के लिए यह बिल्कुल नया इलाका होगा। भारतीय सेना को इन दुर्गम इलाकों के बारे में अधिक जानकारी नहीं होगी। दूसरी तरफ, चीनी इंजीनियर, पीएलए से जुड़े निर्माण संगठन (सीसीईसीसी, चाइना गेजौबा) और सीपीईसी सुरक्षा में पीएलए से जुड़े दस्ते पहले से ही पीओके में सक्रिय हैं। उन्होंने ऐसे निर्माण कार्य किए हैं, जिनका मकसद हमले के दौरान भारतीय सैनिकों के लिए मुश्किलें खड़ी करना है।
शिमला समझौता टूटने का मिलेगा फायदा

एक मीडिया चैनल से बात करते हुए रिटायर्ड कर्नल दिनेश नैन कहते हैं कि “शिमला समझौता तोड़कर पाकिस्तान ने बहुत बड़ी गलती की है। उसकी इस गलती का फायदा भारत को जरूर मिलेगा। अब भारतीय सेना के लिए पीओके में ऑपरेशन करना आसान हो गया है। हालांकि, भारतीय सेना पहले से ही पीओके में छोटे-मोटे हमले करती रही है। साथ ही हमारी सेना और खुफिया एजेंसियों के पास पीओके के बारे में जानकारी है।” उन्होंने कहा कि “शिमला समझौता टूटने के बाद एलओसी की मान्यता भी खत्म मानी जा रही है। ऐसे में अगर भारतीय सेना पीओके में घुसती है तो उसे अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों का सामना नहीं करना पड़ेगा।

टॉप सीक्रेट है भारत का प्लान

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उन्होंने बताया,  सीपीईसी (चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा) का एक बड़ा हिस्सा गिलगित-बाल्टिस्तान से होकर गुजरता है। ऐसे में भारत अगर यहां कोई सीधी कार्रवाई करता है, तो चीन इसे सीधे “रणनीतिक खतरे” के तौर पर देख सकता है और भारतीय सेना के लिए मुश्किल खड़ी कर सकता है। विशेषज्ञों का मानना ​​है कि, आशंका है कि, चीन, भारत को रोकने की कोशिश करेगा। युद्ध की स्थिति में चीन पाकिस्तान को आर्टिलरी इंटेलिजेंस, ड्रोन और सैटेलाइट डेटा दे सकता है। ऐसा भी कर सकता है कि, चीन पाकिस्तान के साथ मिलकर ‘कश्मीर पर हमला’ जैसे नैरेटिव फैला सकता है। ऐसे में सवाल ये है कि, पीओके को पाकिस्तान के कब्जे से छुड़ाने के लिए भारत की संभावित रणनीति क्या होनी चाहिए?  नैन कहते हैं,   “भारतीय सेना पीओके में भी निगरानी करती रहती है। उस इलाके के बारे में भारतीय सेना के पास काफी जानकारी है, लेकिन भारत सरकार क्या करने जा रही है, यह टॉप सीक्रेट है। इसकी जानकारी सिर्फ उन्हीं के पास है, जो इस जुड़े होंगे, इसके अलावा किसी के पास नहीं है।

बड़े पैमाने पर चलाना होगा ऑपरेशन
पीओके को पाकिस्तान के कब्जे से छुड़ाने के लिए भारत की स्पेशल फोर्स को वायुसेना के साथ मिलकर बड़े पैमाने पर ऑपरेशन चलाना होगा और सलामी स्लाइसिंग की रणनीति अपनानी होगी। यानी कि, भारतीय सेना को छोटे-छोटे इलाकों पर कब्जा करते हुए आगे बढ़ना होगा। भारत को सीमित ऑपरेशन चलाकर आगे बढ़ना चाहिए। साथ ही भारत को एलओसी पर दूसरे मोर्चे भी खोलने होंगे। खासकर लीपा वैली और थिटवाल जैसे क्षेत्रों में। साथ ही भारत को आक्रामक इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और सैटेलाइट सर्विलांस से चीन और पाकिस्तान के संयुक्त संचार और लॉजिस्टिक्स को नष्ट करना होगा। इसके अलावा, भारत को पीओके के लोगों के विद्रोह को भी रोकना होगा, जिसके लिए उन्हें कश्मीर में हो रहे घटनाक्रम के बारे में जानकारी देनी होगी और माहौल को अपने पक्ष में करना होगा।
दो मोर्चे  पर लड़ना होगा युद्ध

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भारत को पीओके में अपने खुफिया तंत्र को भी मजबूत करना होगा। इसके अलावा पीओके के लोगों के जहन में पाकिस्तान के खिलाफ असंतोष भरना होगा। इस मामले में भारतीय सेना के एक अन्य  रिटायर्ड मेजर जनरल पीके सहगल का कहना है कि “मेरा मानना है कि, भारत को अभी पीओके में ऑपरेशन नहीं करना चाहिए, पीओके बेहद दुर्गम इलाकों से एक है, यहां  पहाड़ी इलाके और उस पर घने जंगल हैं, जो सेना को बेहद मुश्किल में डाल सकते हैं। उन्होंने कहा, “भारत जो भी ऑपरेशन करेगा वो टॉप सीक्रेट होगा, लेकिन पीओके को लेने की कोशिश करेगा तो उसे दो मोर्चों पर युद्ध लड़ना पड़ सकता है। दरअसल, चीन ने पीओके में करीब 65 बिलियन डॉलर का भारी भरकम निवेश किया है। वहां बड़ी संख्या में चीनी सैनिक मजदूर के तौर पर रहते हैं। चीन ने उस इलाके में मिसाइलें और हथियार तैनात कर रखे हैं, जो भारतीय सेना को चुनौती देंगे।
हथियार पहुंचाने में आएगी मुश्किल 
पीओके के दुर्गम इलाकों में भीषण लड़ाई के बीच भारी हथियार, तोपें या टैंक पहुंचाना भारत के लिए बेहद मुश्किल होगा। ऐसे में भारत को पैदल सेना और विशेष बलों कोआगे बढाना होगा। इधर, पाकिस्तान ने एफसीएनए (फोर्स कमांड नॉर्दर्न एरियाज) भी इस इलाके में तैनात किया है। भारत आगे बढ़ने के लिए इन्हें नष्ट करना होगा। इस फ़ोर्स का काम गिलगित-बाल्टिस्तान संभालना है। भारत को इन इलाकों के चप्पे-चप्पे पर भारी गोलाबारी करनी होगी और उन्हें बेअसर करना होगा। पीओके की सीमाओं पर भारत के पास सड़क संपर्क सीमित होगा। वहीं, वाहनों से रसद भेजना धीमा और निशाना साधने लायक है, लेकिन पाकिस्तान के पास अंदरूनी रास्तों की जानकारी होगी, जिसका उसे फायदा मिलेगा।
सैन्य गतिविधि के लिए अहम है ये रास्ता
जैसे कि, लीपा घाटी, जो काजीनाग स्प्रिंग के रास्ते में करीब नौ किलोमीटर लंबी है और ये रास्ता हमेशा आतंकी घुसपैठियों के लिए अहम रहा है। यह इलाका तूतूमारी गली से बंगस घाटी से चोकीबल होते हुए श्रीनगर को जाता है, जो इसे सैन्य दृष्टि से बेहद अहम बनाता है। साल 1971 के युद्ध में भारत ने यहां के कुछ इलाकों पर पर कब्जा जमा लिया था। नतीजतन, यहां पाकिस्तान की सैन्य स्थिति कमजोर हो गई थी। हाल के दिनों में लीपा घाटी में भारतीय और पाकिस्तानी सेना के बीच भारी गोलीबारी की खबरें आई हैं। भारतीय सेना ने आतंकी लॉन्च पैड्स को निशाना बनाया है। हालांकि, भारत की सैन्य कार्रवाई सीमित रही है। वहीं, खबर है कि पिछले कुछ दिनों से इस इलाके में पाकिस्तानी सेना की मौजूदगी और गतिविधियां काफी बढ़ गई हैं, जिससे गतिरोध भी बढ़ा हुआ है।
भारतीय सैनिकों को बंद करना पड़ा ऑपरेशन 

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एक रिपोर्ट में लिखा गया है कि, 1971 के युद्ध में तंगधार से लिपा तक का क्षेत्र सिर्फ़ एक फ़ुटनोट था, जहां दोनों पक्ष बस ऊंची ज़मीन पर कब्ज़ा करना चाहते थे। भारत के आधिकारिक युद्ध इतिहास में दर्ज है कि, 104 इन्फ़ेंट्री ब्रिगेड ने तुतमारी गली के ज़रिए हमले के ख़िलाफ़ कश्मीर को सुरक्षित करने के लिए लिपा और तंगधार के आस-पास की ऊंचाइयों पर कब्ज़ा किया था। कब्जे में लिए गए प्रमुख ठिकानों में घाटी की ओर देखने वाला नौकोट भी शामिल था। हालांकि कुछ सफलताएं हासिल की गईं, लेकिन इससे पहले कि, भारतीय पक्ष शिशालेदी, ज़ियारत और जमुआ में चौकियों पर कब्ज़ा करके सीमा को और सुरक्षित कर पाता, 1971 का युद्ध विराम लागू हो गया और भारतीय सैनिकों को ऑपरेशन बंद करना पड़ा।
हर मोर्चे पर घेरना होगा पाकिस्तान को
ऐसे  में आशंका ये भी है कि, यदि भारत इस बार सैन्य कार्रवाई करता है, तो वह एलओसी के अंदर ज्यादा दूरी तक नहीं कर पायेगा। वह एलओसी में कुछ किलोमीटर के दायरे में ही आतंकी ठिकानों को नष्ट कर सकता है। ऐसा करने से पूर्ण युद्ध का खतरा टल सकता है। रक्षा विशेषज्ञ पीके सहगल कहते हैं कि, सेना को अपनी ताकत के साथ-साथ मल्टी डोमेन वॉरफेयर को भी आगे बढ़ाना होगा। भारत को सैन्य शक्ति, कूटनीति, खुफिया नेटवर्क और आर्थिक दबाव के साथ हर मोर्चे पर पाकिस्तान को घेरना होगा।
पाक सेना पर करना होगा हवाई हमला

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वहीं, कई अन्य विशेषज्ञों का कहना है कि, चीन को साफ संदेश देना होगा कि, अगर वह पाकिस्तान को सक्रिय सैन्य समर्थन देता है तो यह युद्ध पूरे दक्षिण एशिया को प्रभावित करने के साथ-साथ चीन के लिए भी नुकसानदायक साबित होगा। भारत को इस युद्ध को जीतने के लिए अपने पैरा एसएफ, घातक प्लाटून जैसे विशेष बलों और मार्कोस जैसे दस्तों को मोर्चे पर उतारना होगा। साथ ही भारतीय वायुसेना को मिराज-2000, एसयू-30एमकेआई और राफेल जैसे लड़ाकू विमानों से पाकिस्तान की सेना पर हमला करना होगा।  इस दौरान उसे ये ध्यान रखना होगा कि इस हमले का शिकार पाक अधिकृत कश्मीर यानी पीओके न हो।

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