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Winter Forest Fire: टूट रहा चक्र, बर्फबारी के मौसम में पहाड़ों पर हो रही बरसात, क्या कहते हैं वैज्ञानिक और अधिकारी?

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  नई दिल्ली। Winter Forest Fire: पहाड़ी जंगलों में आग लगना कोई नई बात नहीं है, ये सिलसिला दशकों से चला आ रहा है, लेकिन सर्दी में मौसम में जब पहाड़ों पर बर्फबारी होनी चाहिए, तब आग लगाने की घटना जरूर चौंकाती है। भारत के पहाड़ी राज्यों में पिछले कुछ वर्षों से ऐसा ही हो रहा है। यहां जम्मू कश्मीर, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के जंगल इन दिनों भीषण आग की चपेट में हैं। आइए जानते हैं, इस बारे में वैज्ञानिक और फारेस्ट अफसरों का क्या कहना है।

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मानवीय गतिविधियां भी जिम्मेदार

Winter Forest Fire

वैज्ञानिक और वन अधिकारियों का कहना है कि, अब ये कोई असामन्य घटना नहीं रह गई है, जलवायु परिवर्तन और बदलते पारिस्थितिक पैटर्न का ये खतरनाक संकेत है। इस साल सर्दी में सबसे पहले उत्तराखंड के जंगलों में आग लगी, इसके बाद हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर के जंगल आग की चपेट आये और धीरे-धीरे विस्तार रूप ले लिया।

विशेषज्ञों का कहना है कि, जंगल में आग सिर्फ प्राकृतिक कारणों से नहीं लग रही है, बल्कि इसके लिए मानवीय गतिविधियां भी जिम्मेदार हैं। जैसे कि कस्तूरी मृग जैसे जानवरों का शिकार करने के लिए शिकारी जानबूझकर जगंल में आग लगा देते और बुझाते नहीं है। ये आग धीरे-धीरे विकराल रूप ले लेती है।

अधिकारियों ने भी जंगल में आग लगने की घटना के पीछे कुछ मानवीय  गतिविधियों को ही जिम्मेदार ठहराया है। अफसरों का कहना है कि, जंगल के किनारे स्थित खेतों में पराली जलाना, जैव-द्रव्यमान और ठोस अपशिष्ट जलाना आदि शामिल है। इसके अलावा कुछ ग्रामीण मवेशियों के लिए नई घास उगाने के उद्देश्य से जंगल की जमीन पर आग लगा देते हैं, जो कई बार पूरे जंगल को अपनी चपेट में ले लेती है।

बदल रहा पैटर्न

फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) के आकड़ों पर गौर करें, तो सर्दियों का सीजन शुरू होने के बाद यानी 1 नवंबर से लेकर अब तक उत्तराखंड में देश में सबसे अधिक 1,756 ‘फायर अलर्ट’ दर्ज किए गए हैं। यह आकड़ें उन संवेदनशील राज्यों जैसे महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ को पीछे छोड़ रहे हैं, जहां आमतौर पर आग लगने की घटनाएं अधिक होती थी।

देश भर के जंगलों में जिस तरह से आग लगने का पैटर्न बदल रहा है, उसे समझने के लिए देहरादून स्थित वन अनुसंधान संस्थान के सीनियर वैज्ञानिक अमित कुमार और उनकी टीम ने पांच साल तक अध्ययन किया। उन्होंने बताया, जगंल में आग लगना एक प्राकृतिक घटना है, लेकिन सर्दियों ने जो आग लग रही है, वह जलवायु परिवर्तन के आ रहे बदलाव की वजह से लग रही है।

अत्याधिक शुष्कता भी है वजह

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वैज्ञनिकों का कहना है कि, उत्तराखंड की तरह ही हिमाचल प्रदेश में भी पिछले साल अक्टूबर के पहले सप्ताह से बरसात नहीं हुई थी,  जिसके चलते कुल्लू, मंडी, शिमला और चंबा जैसे प्रमुख सेब उत्पादक क्षेत्रों में बर्फबारी न के बराबर हुई थी। राज्य भर के जंगलों में आग लगने की घटनाएं बढ़ गई हैं। राज्य वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, शिमला वन क्षेत्र में सबसे अधिक (62), रामपुर (16), मंडी (8), ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क-कुल्लू (6), चंबा और कुल्लू (4-4), और बिलासपुर और वन्यजीव (दक्षिण) क्षेत्र (2-2) बार आग लगने की घटना घटी।

वैज्ञानिकों का कहना है कि, पहाड़ी क्षेत्र के जंगलों में आग लगने की घटना का सबसे मुख्य कारण अत्याधिक शुष्कता है। पिछले साल अक्टूबर के बाद हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के जंगलों में न के बराबर बरसात हुई। वहीं, कश्मीर में इस बार 40 प्रतिशत से कम बर्फबारी दर्ज की गई।

बिखरी पत्तियां और सूखी घासें बन रहीं बारूद

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वैज्ञानिकों का मानना है कि, मिटटी में नमी न होने के कारण जंगल में बिखरी पत्तियां और सूखी घासें बारूद का रूप धारण कर लेती हैं, जिससे एक छोटी चिंगारी भी भयानक आग की वजह बन जाती है। अधिकारियों और वैज्ञानिकों का कहना है कि सर्दियों में जिस तरह से जंगलों में आग लग रही है, उसके परिणाम घातक हो सकते हैं, अगर जलवायु और वन प्रबन्धन का अनुकूल ध्यान नहीं रखा गया, तो हिमालय का परिस्थितिकी तंत्र पूरी तरह से नष्ट हो जायेगा।

 

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