
नई दिल्ली। UN Failed Against Terrorism: मंगलवार 22 अप्रैल को जम्मू कश्मीर के मिनी स्विट्जरलैंड माने जाने वाले पिकनिक स्पॉट पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद आई यूएन की आधिकारिक प्रतिक्रिया को देखकर हर कोई हैरान रहा गया। दरअसल, यूएन ने बेहद हल्के शब्दों में निंदा प्रस्ताव रखा था, जो चौंकाने वाला था। चूंकि, पाकिस्तान इस समय भारत की जांच से खुद को बचाने की हर मुमकिन कोशिश कर रहा है। इसमें वह चीन की मदद लेने के भी प्रयास में जुटा है। हालांकि, भारत हर मोर्चे पर पाकिस्तान को घेर रहा है। मंगलवार को भी भारत ने एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान को बेनकाब किया और आतंकवाद को समर्थन देने की उसकी नीतियों को उजागर किया।
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यूएन की भूमिका पर उठी रही उंगली

आपको बता दें कि, संयुक्त राष्ट्र को वैश्विक शांति और सुरक्षा का प्रहरी माना जाता है, लेकिन हाल के वर्षों में उसकी भूमिका पर उंगली उठने लगी है। सवाल ये भी है कि, क्या यूएनएससी सिर्फ ताकतवर देशों के हितों को साधन वाला मंच बन गया है, जहां आम देशों की आवाजें दबा दी जाती हैं। जिस संस्था में न्याय और निष्पक्षता की जगह राजनीति ले लेती है, उस संस्था को गंभीरता से लेना मुश्किल हो जाता है।
कमजोर हुई विश्वसनीयता
चूंकि संयुक्त राष्ट्र (यूएन) का निर्माण दुनिया में शांति बनाए रखने के लिए किया गया था। ऐसे में बार-बार विफल और अप्रभावी होने के कारण यूएन की विश्वसनीयता कमजोर होती हुई दिख रही है। हाल के वर्षों में यह संस्था एक निष्क्रिय और पक्षपाती मंच बनती जा रही है। चाहे रूस-यूक्रेन युद्ध हो या इजरायल-हमास संघर्ष, आतंकवाद का मुद्दा हो या ग्लोबल साउथ की चिंताएं… यूएन हमेशा से ही सिर्फ बयानबाजी करता नजर आया है। बड़ा सवाल यह है कि, क्या भारत जैसे उभरते वैश्विक नेता को अब यूएन को गंभीरता से लेना चाहिए? या उसे अपनी स्वतंत्र रणनीति पर ध्यान देना चाहिए और अपने हिसाब से फैसले लेने चाहिए?
ताकतवर देशों का मंच बना UN?
वर्ष 2022 में रूस ने यूक्रेन पर अटैक किया, लेकिन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) कोई ठोस कार्रवाई नहीं कर सकी। इस युद्ध ने यूएनएससी की कमजोरी को उजागर कर दिया। रूस खुद इस संघर्ष का स्थायी सदस्य है और वीटो पावर का उपयोग करके किसी भी प्रस्ताव को रोक देता है। यूएन महासभा ने रूस की निंदा जरूर की, लेकिन इसका कोई ठोस परिणाम नहीं निकला। इसलिए, यूएन युद्ध रोकने या सही समाधान खोजने में पूरी तरह असहाय दिखा। यह युद्ध अब तीसरे साल में है और लाखों लोग विस्थापित हो चुके हैं। यूएन मानवाधिकार प्रमुख ने इसे भयानक मानवीय वाला संकट बताया, लेकिन न तो रूस को रोक पाया और न ही यूक्रेन पर कोई दवाब बना पाया। ऐसे सवाल यह है कि क्या यह संस्था अब सिर्फ ताकतवर देशों के हितों की रक्षा का मंच बन गई है? छोटे और कमजोर देशों के हित उसके लिए कोई अहमियत नहीं रखते हैं।
चिंता जताकर कर्तव्य पूरा करता है UN

इसके बार इजराइल-हमास युद्ध में संयुक्त राष्ट्र कुछ ठोस काम नहीं कर था। ऐसे में इस युद्ध को लेकर भी यूएन की भूमिका सवालों के घेरे में आ गई। 7 अक्टूबर 2023 को जब हमास ने इजराइल पर आतंकी किया था और 40 नवजातों समेत सैकड़ों इजराइलियों की हत्या कर दी थी। इसके बाद इजराइल की जवाबी कार्रवाई में पूरी गाजापट्टी को तबाह कर दिया। इन दोनों घटनाओं में भी संयुक्त राष्ट्र सिर्फ युद्ध विराम की अपील की करके रह गया, लेकिन न तो इजराइल और न ही हमास ने इसकी परवाह की। पश्चिम एशिया में क्षेत्रीय तनाव बढ़ने के बावजूद संयुक्त राष्ट्र की भूमिका अपील तक ही सीमित रही। यानी जब हजारों बेगुनाह लोग मारे जा रहे थे, तब संयुक्त राष्ट्र सिर्फ ‘चिंता’ जताकर अपना कर्तव्य पूरा कर रहा था।
कारगर नहीं UN की नीतियां

भारत जैसे देशों के लिए संदेश साफ है- संयुक्त राष्ट्र में न्याय या समानता नहीं, बल्कि राजनीति है। आतंकवाद के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र की नीतियां भी कारगर नहीं रही हैं। भारत लंबे समय से पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद का शिकार रहा है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र अक्सर इस पर खामोश रहता है या नाममात्र की निंदा करता है। रूस और पश्चिमी देशों ने इस्लामिक स्टेट (IS) जैसे संगठनों के खिलाफ अलग-अलग रणनीति अपनाई, लेकिन संयुक्त राष्ट्र कोई एकजुट कार्रवाई नहीं कर सका।
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भारत क्यों करें भरोसा?

भारत ने संयुक्त राष्ट्र से आतंकवाद की व्यापक परिभाषा और कार्रवाई की मांग बार-बार की, लेकिन स्थायी सदस्यों के परस्पर विरोधी हितों ने उसे रोक दिया। जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित करने में संयुक्त राष्ट्र को सालों लग गए। वह भी तब, जब चीन जैसे देश लगातार वीटो लगा रहे थे। ऐसे में भारत ऐसी संस्था पर भरोसा क्यों करे?
वैश्विक मंचों पर निर्णायक भूमिका निभा रहा भारत
संयुक्त राष्ट्र की सबसे बड़ी कमजोरी इसका पुराना ढांचा है। सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य (अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस) के पास वीटो पावर है, जिससे वे किसी भी प्रस्ताव को रोक सकते हैं। यह व्यवस्था द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की है और अब समय के साथ अप्रासंगिक हो गई है। उभरते देशों जैसे भारत को स्थायी सदस्यता न देना संयुक्त राष्ट्र की विश्वसनीयता को कमजोर करता है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है, जिसने जी-20 की अध्यक्षता की है और वैश्विक मंचों पर महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। फिर भी, सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता पर अभी तक कोई ठोस फैसला नहीं हो पाया है।
संयुक्त राष्ट्र में सुधार की जरूरत
विशेषज्ञों का कहना है कि, क्या इससे संयुक्त राष्ट्र की निष्पक्षता और समावेशिता पर सवाल नहीं उठते? समय आ गया है कि भारत संयुक्त राष्ट्र में सुधार की मांग तेज करे। अगर संयुक्त राष्ट्र की नीतियां समय के हिसाब से नहीं बदलती हैं, तो भारत को उसे क्यों गंभीरता से लेना चाहिए। सच ये हैं कि क्वाड, ब्रिक्स, जी-20 जैसे विकल्प अब ज्यादा कारगर ही रहे हैं और इन मंचों पर भारत की आवाज सुनी जा रही है और उसका असर भी देखने को मिलता है। साल 2023 में जापान के हिरोशिमा में हुए जी-7 शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सवाल उठाया था कि, यदि संयुक्त राष्ट्र और सुरक्षा परिषद आज की दुनिया की वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित नहीं करते हैं, तो वे मात्र ‘बातचीत का मंच’ ही बनकर रह जाएंगे।
पहलगाम हमले से दुनिया में मचा हड़कंप

दरअसल, 22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में आतंकियों ने हमला किया था, जिसमें 26 पर्यटकों की मौत हो गई थी। करीब 16 पर्यटक घायल हुए थे। इस आतंकी घटना ने पूरी दुनिया में हड़कंप मचा दिया है। इस हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के रिश्ते रसातल में पहुंच गए हैं। ऐसे में संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ और भारत के विदेश मंत्री जयशंकर से फोन पर बात की है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव गुटेरेस ने पहलगाम हमले की कड़ी निंदा की और मामले में न्याय और जवाबदेही तय करने पर जोर दिया।
पीएम मोदी ने उठाया सवाल
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उन्होंने शाहबाज शरीफ और जयशंकर से फोन पर बात की कानूनी तरीकों से जवाबदेही सुनिश्चित करने की बात कही। पीएम मोदी ने इस आश्चर्य जताया और कहा, जब इन चुनौतियों से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र का गठन किया गया है, तो हमें विभिन्न मंचों पर शांति और स्थिरता से जुड़े मुद्दों को उठाने की आवश्यकता क्यों पड़ती है।
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