
नई दिल्ली। Supreme Court: गंभीर आर्थिक अपराधों की जांच और रोकथाम करने वाली संस्था प्रवर्तन निदेशालय (ED) की कार्यप्रणाली पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए हैं। साथ ही उसकी जांच प्रक्रिया की तीखी आलोचना की है। अदालत ने कहा, प्रवर्तन निदेशालय (ED) बिना ठोस सबूत के किसी पर आरोप लगाने की आदत को तत्काल बंद करे। कोर्ट की ये टिप्पणी आते ही सियासी गलियारों में हलचल मच गई है। बता दें कि, विपक्ष लंबे टाइम से ईडी की इस आदत को आधार बनाकर मोदी सरकार पर हमला करता रहा है। विपक्ष का कहना है कि, मोदी सरकार राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को निशाना बनाने और उनकी आवाज़ दबाने के लिए ईडी का बराबर इस्तेमाल कर रही है।
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जांच में पारदर्शिता लाने के निर्देश
एक रिपोर्ट में बताया गया कि, सोमवार 5 मई को मनी लॉन्ड्रिंग मामलों में ED की जांच प्रक्रिया को सुप्रीम कोर्ट ने “गैर-पारदर्शी” करार दिया है। साथ ही जांच एजेंसी को कड़े शब्दों में कहा है कि, बिना सबूत के आरोप लगाना न सिर्फ गैरकानूनी है, बल्कि यह कानूनी प्रक्रिया के खिलाफ भी है। कोर्ट ने ED को अपनी जांच में पारदर्शिता लाने और मानवाधिकारों का पालन करने को कहा है।
दिल्ली हाईकोर्ट भी लगा चुका है फटकार

बता दें कि, ऐसा पहली बार नहीं है जब ED की कार्यशैली पर उंगली उठी है। इससे पहले इसी साल जनवरी महीने में हरियाणा के पूर्व कांग्रेस विधायक सुरेंद्र पंवार के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने ED की 15 घंटे की लगातार पूछताछ को “अमानवीय” और “क्रूर” करार दिया था। कोर्ट ने उस वक्त भी ED को अपनी प्रक्रिया में सुधार लाने की नसीहत दी थी। दिल्ली हाईकोर्ट भी ईडी को कई बार फटकार लगा चुका है। हाईकोर्ट ने कथित दिल्ली वक्फ बोर्ड घोटाले में कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में आरोपी आप विधायक अमानतुल्लाह खान को जमानत देते हुए मुकदमे में देरी के लिए ईडी की खिंचाई की थी और कार्यशैली में सुधार लाने को कहा था। हाईकोर्ट ने कहा था कि “अपनी ताकत और संसाधनों को त्वरित सुनवाई पर लगाने के अपेक्षा राज्य और उसकी एजेंसियों से स्वतंत्रता के समान समर्थक होने की उम्मीद की जाती है।”
विपक्ष लगातार उठा रहा उंगली

गौरतलब है कि, विपक्षी दल ईडी की कार्यशैली के खिलाफ लगातार आवाज उठा रहे और हैं राजनीति से प्रेरित होकर काम करने का आरोप लगा रहे हैं। कांग्रेस, सपा, आम आदमी पार्टी (AAP) और तृणमूल कांग्रेस समेत कई राजनीतिक दलों का खुला आरोप है कि, मोदी सरकार ने ईडी को “विपक्ष मिटाओ सेल” बना दिया है। कांग्रेस नेता और रायबरेली सांसद राहुल गांधी का कहना है कि, “ED अब कानून का रखवाला नहीं है, बल्कि अब वह सियासी हथियार बन चुका है।” आम आदमी पार्टी के संजय सिंह भी ED, CBI और आयकर विभाग जैसी जांच एजेंसियों की कार्यशैली पर उंगली उठा चुके हैं और इसे इस्तेमाल का आरोप लगा चुके हैं। सिंह का कहना है कि, जांच एजेंसियों का इस्तेमाल अब केवल विपक्षी नेताओं को डराने और उनकी आवाज़ दबाने के लिए किया जा रहा है।
SC की टिप्पणी के बाद उठे ये सवाल
विपक्ष का यह भी आरोप है कि, 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद गैर भाजपा शासित राज्यों में ED की कार्रवाइया तेज़ हुई हैं। कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने 2022 में अपने एक बयान के आरोप लगाया था कि, ED के दुरुपयोग से देश की लोकतांत्रिक नींव कमज़ोर हो रही है और अब सुप्रीम कोर्ट की ताज़ा टिप्पणी ने उनके दावों को मजबूत कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट की ताजा फटकार के बाद सवाल उठ रहा है कि, क्या ED अपनी कार्यप्रणाली में सुधार करेगी? क्या मोदी सरकार विपक्ष के इन गंभीर आरोपों का जवाब देगी? क्या यह मुद्दा देश के एक बड़े वर्ग को उसका नजरिया बदलने में मदद करेगा?
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छत्तीसगढ़ शराब घोटाला मामला

बता दें कि, सोमवार 5 मई को 2,000 करोड़ रुपये के छत्तीसगढ़ शराब घोटाले में मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपी की ज़मानत याचिका की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अभय ओका ने ईडी पर मौखिक रूप से कई टिप्पणियां कीं और उसे कार्यशैली में सुधार लाने का निर्देश दिया। दरअसल, छत्तीसगढ़ के इस हाई प्रोफाइल केस में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य बघेल के आवास पर करीब दो महीने पहले छापा मारा गया था। ईडी का आरोप है कि, इस घोटाले में राज्य के उच्च अधिकारियों, व्यक्तियों और राजनीतिक नेताओं को काफी लाभ हुआ है।
2,000 करोड़ रुपये की रिश्वत का आरोप

इस घोटाले में डिस्टिलर से करीब 2,000 करोड़ रुपये की रिश्वत ली गई थी और देशी शराब को बिना बताए बेचा जा रहा था। सुनवाई के दौरान जस्टिस ओका ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू से पूछा, “आपने एक खास आरोप लगाया है कि, उसने 40 करोड़ रूपये कमाए हैं, लेकिन अब आप इस व्यक्ति का इस कंपनी या किसी अन्य कंपनी से संबंध होने का कोई सबूत नहीं दिखा पा रहे हैं। आपको इस बात का कोई सबूत देना चाहिए कि, वह इन कंपनियों का निदेशक है या नहीं, या फिर वह बहुसंख्यक शेयरधारक है या नहीं, क्या वह प्रबंध निदेशक है। इस व्यक्ति का उस कंपनी से कुछ तो संबंध होना ही चाहिए।” इस पर राजू ने दलील दी, “कोई व्यक्ति किसी कंपनी को कंट्रोल कर सकता है, लेकिन ये जरूरी नहीं कि उसके पास कंपनी के संचालन की भी जिम्मेदारी हो।
कोर्ट ने कहा-
उन्होंने कहा, मैं बयानों से दिखाऊंगा कि, ये व्यक्ति कंपनी से कैसे जुड़ा है।” इससे पहले 29 अप्रैल को इसी मामले में एक अन्य सुनवाई में जस्टिस ओका और जस्टिस उज्जल भुईया की बेंच ने टिप्पणी की थी और सवाल किया था “जांच अपनी गति से चलेगी, यह अनंत काल तक चलती रहेगी। तीन आरोपपत्र दाखिल किए जा चुके हैं। आप व्यक्ति को हिरासत में रखकर उसे दंडित कर रहे हैं। कोर्ट ने टिप्पणी की थी, आपने अपनी जांच प्रक्रिया को ही सजा बना दिया है।”
पहले भी हो चुकी है आलोचना
आपको बता दें कि, इससे पहले भी केंद्रीय जांच एजेंसियों को सुप्रीम कोर्ट की तीखी आलोचना का सामना करना पड़ा है। पिछले साल नवंबर में बंगाल के पूर्व शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी की जमानत याचिका पर सुनवाई करने के दौरान भी जस्टिस भुईया और जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने ईडी की खराब सजा दर पर आलोचनात्मक टिप्पणी की थी। बेंच ने कहा था, “एएसजी साहब, प्रव्त्न निदेशालय (ED) के लिए आपकी सजा दर क्या है?… यह बहुत खराब है… अगर यह 60 से 70 फीसदी होती तो भी हम समझ सकते थे।”
कनिष्ठ गृह मंत्री नित्यानंद राय ने पिछले साल यानी 6 अगस्त 2025 को संसद को सूचित किया था कि साल 2014 से लेकर 2024 तक मनी लॉन्ड्रिंग अधिनियम के तहत दर्ज किये गये 5,297 मामलों में से 40 मामलों में दोष सिद्ध हुआ जबकि तीन लोगों को बरी किया गया। इसके कुछ दिनों बाद जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस उज्ज्वल भुईया की तीन जजों की पीठ ने ईडी को वैज्ञानिक जांच करने का निर्देश दिया था। बेंच ने कहा था, “आपको अभियोजन और साक्ष्य की गुणवत्ता पर ध्यान देने की जरूरत है। सभी मामले जहां आप संतुष्ट हैं कि प्रथम दृष्टया मामला बनता है, आपको उन मामलों को कोर्ट में लाने की आवश्यकता है।”
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