
छत्तीसगढ़। CRPF: छत्तीसगढ़ से नक्सलियों का सफाया करने की ठान चुकी सीआरपीएफ और उसकी विशेष कोबरा इकाई नक्सलियों के ठिकानों को ‘नेस्तानाबूत’ करने में जुटी हुई है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी इस साल की शुरुआत में ऐलान किया था कि 31 मार्च 2026 तक देश पूरी तरह से नक्सल मुक्त हो जायेगा। इस दिशा में सीआरपीएफ तेजी से कार्रवाई कर रही है और आगे बढ़ रही है।
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कटीले तारों से की गई गई फेसिंग

गृहमंत्री ने ऐलान किया था कि, डीआरजी सहित दूसरे बल भी नक्सलियों को खत्म करने में लगे हैं। घने जंगलों में स्थित ‘फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस’ (एफओबी), जहां टेक्नोलाजी नहीं पहुंच सकती है, वहां पर सीआरपीएफ ने देशी तकनीकी अपनाकर मजबूत सुरक्षा व्यवस्था विकसित की है। सीआरपीएफ ने नक्सल प्रभावित इलाकों में बने अधिकतर कैंप या एफओबी की फेसिंग कंटीली तार से कर दी है और उस पर शराब/बीयर की बोतलें टांगी हैं। हालांकि, ये देखने में कुछ अटपटा सा लगता होता, लेकिन ये एक प्रभावी ‘मैनुअल अलार्मिंग सिस्टम’ है। इस सिस्टम की वजह से अगर कोई भी इन्सान या जानवर, तारों को टच करेगा, तो ये कांच की बोतलें, आपस में टकराएंगी और इसकी आवाज सुनकर एफओबी पर तैनात सुरक्षा कर्मी सतर्क हो जाएगी और दुश्मन को उन पर हमला करने का मौका नहीं मिलेगा।
जानवरों का भी रहता है आतंक
एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, छत्तीसगढ़-तेलंगाना बॉर्डर पर स्थित कर्रेगुट्टा पहाड़ी पर स्थित एफओबी ‘गलगम’ में कुछ इसी तरह की सुरक्षा व्यवस्था देखने को मिली। सीआरपीएफ ने ‘कर्रेगुट्टा’ के आसपास कई एफओबी स्थापित की हैं। उसके सभी तरह के सर्च एवं दूसरे ऑपरेशन इन्हीं एफओबी से संचालित होते हैं। इस एफओबी को देखने से लग रहा है कि सीआरपीएफ ने इन्हें स्थापित करने में कितनी मुश्किलें उठाई होंगी। ये एफओबी जंगल के बीच है और पहाड़ियों से घिरी हैं। इस क्षेत्र में जंगली जानवरों का भी आतंक रहता है। यहां रेंगने वाले जीव, कोबरा प्रजाति के सांप समेत अन्य तरह के जहरीले जीव पाए जाते हैं।
सतर्क हो जाते है सुरक्षा कर्मी

सीआरपीएस ने यहां स्थापित एफओबी को सुरक्षित बनाने के लिए कई परतों वाला सिक्योरिटी सिस्टम तैयार किया है। यहा कंटीली तार और गहरी खाई सहित तीन लेयर वाली सुरक्षा व्यवस्था है। वैसे तो ये देखने में एकदम सामान्य है कि एफओबी की बाहरी लेयर वाली फेंसिंग पर शराब और बीयर की बोतलें टंगी रहती हैं। इन्हें थोड़ी दूर-दूर पर लटकाया जाता है। बोतलों को अलग-अलग नहीं वाली दो से तीन को एक साथ बांधा जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है, ताकि कोई भी जानवर या व्यक्ति फेंसिंग पार करने की कोशिश करें तो बोतलें आपस में टकराएं और तेज आवाज हो, जिसे सुनकर सुरक्षा कर्मी सतर्क हो जाते हैं और फेंसिंग के उस हिस्से तरफ पहुंच जाते हैं, जिधर से आवाज आई होती है।
‘मैनुअल अलार्मिंग सिस्टम’ दिया है नाम
सीआरपीएफ इसे ‘मैनुअल अलार्मिंग सिस्टम’ कहती है। इस सिस्टम को तैयार करने में कोई खास खर्च नहीं आता, लेकिन इससे सुरक्षा को चाक चौबंद रखने में काफी मदद मिलती है। ये सिस्टम कई बार खुद को साबित भी कर चुका है। कुछ स्थानों पर लाइट की पर्याप्त व्यवस्था न होने के की वजह से ये बेहद मददगार साबित होता है। इसके अलावा सर्दियों में कोहरे या धुंध के दौरान भी इसकी वजह से फेंसिंग के आसपास का कुछ भी क्लीयर दिखाई नहीं देता है। सीआरपीएफ ने अपने अन्य कैंपों पर भी इसी तरह का सिस्टम को लगाया है। ये ‘मैनुअल अलार्मिंग सिस्टम’ न सिर्फ भारत में बल्कि विदेशों में भी सुरक्षाबल इस्तेमाल करते हैं।
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