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Race Course Mosque: जमींदोज होगी ये ऐतिहासिक मस्जिद?, बचाने की मुहिम तेज

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Race Course Mosque

 नई दिल्ली। Race Course Mosque: प्रधानमंत्री आवास के पास बनी 150 साल पुरानी मस्जिद अब बीते जमाने की बात होने वाली है। दरअसल, दिल्ली की रेखा गुप्ता सरकार ने अब इस पर नजरें टेढ़ी कर ली है और इसे ढहाने का नोटिस मस्जिद कमेटी को दे दिया गया है। मस्जिद से ताल्लुक रखने वाले मुसलमानों का कहना है कि, मस्जिद का बिजली और पानी का कनेक्शन भी सरकार ने काट दिया है। उधर, नोटिस मिलने के बाद से मुस्लिम समुदाय में आक्रोश फ़ैल गया है और सोशल मीडिया पर इसे बचाने की मुहिम छिड़ गई है।

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नोटिस पर जताई आपत्ति

Race Course Mosque

एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और कश्मीर के मीरवायज उमर फारुक जैसे तमाम मुस्लिम नेताओं ने सरकार के फैसले और नोटिस पर आपत्ति जताई है। वहीं, जमीयत उलमा-ए-हिन्द ने Race Course Mosque को बचाने की अपील की है। मकतूब नाम के एक मीडिया प्लेटफार्म ने वीडियो शेयर के बताया कि, 20 अक्टूबर को लोगों को मस्जिद के अंदर जाने से भी रोका गया।

साल 1857 से 1900 के बीच यानी ब्रिटिश काल में बनाई गई ये मस्जिद नई दिल्ली नगर पालिका परिषद की वेबसाइट पर विरासत संपत्ति के रूप में सूचीबद्ध है जबकि भूमि एवं विकास कार्यालय का साफ दावा है कि, ये सरकारी जमीन पर है और परिसर अनाधिकृत है। 

छह दिन के अंदर परिसर खाली करने का आदेश

ऐसे में विभाग ने इसे छह दिन के अंदर खाली करने का आदेश दे दिया है। साथ ही ये भी निर्देश दिया है कि, अगर इस समय सीमा के भीतर मस्जिद खाली नहीं की जाती, तो तोड़-फोड़ और बेदखली की कार्रवाई की जाएगी। ऐसे में अब मस्जिद की ऐतिहासिकता और कानूनी स्थिति पर सवाल उठने लगे हैं। सवाल ये उठ रहा है कि, जिस मस्जिद को सरकारी रिकॉर्ड में विरासत के रूप में सूचीबद्ध किया गया है, उसकी धार्मिक और कानूनी स्थिति आखिर है क्या। 

 

मुस्लिम संगठन ने भूमि एवं विकास कार्यालय के दावे पर सवाल उठाते हुए मस्जिद और उसके पास स्थित कब्रिस्तान को बचाने की मांग केंद्र सरकार से की है। प्रशासन का दावा सच है या मस्जिद कमेटी और मुस्लिम संगठनों का, जो मस्जिद के वक्फ में शामिल होने और उसके ऐतिहासिक दर्जे का हवाला दे रहे हैं, जिसका वे सबूत भी दिखा रहे हैं, लेकिन सरकार अपने ही दावे पर अड़ी है। ऐसे में आने वाले समय में अगर विवाद गहरा जाये तो अतिश्योक्ति नहीं होगी।

हटाया जा रहा अतिक्रमण

 आपको बता दें कि, ये ऐतिहासिक रेस कोर्स मस्जिद (Race Course Mosque) 7 लोक कल्याण मार्ग पर प्रधानमंत्री के अधिकारिक आवास के निकट ही स्थित है। दरअसल, इस समय प्रधानमंत्री के अधिकारिक आवास के आसपास के इलाके में स्थित अतिक्रमण को हटाये जाने की कार्रवाई तेजी से चल रही है। यहां स्थित तमाम झुग्गी झोपड़ियों को भी हटाया जा चुका है। ये मस्जिद भी इसी कार्रवाई की जद में आ गई है।

 सरकार का तर्क है कि, ये बेदखली पीएम आवास की सुरक्षा के मद्देनजर की जा रही है। कुछ सरकारी अधिकारियों के मुताबिक, बीते 19 अक्टूबर को ही हाईकोर्ट ने इस कार्रवाई की इजाजत दे दी थी। साथ ही ये भी 

मस्जिद की विरासत सबंधी पहचान अहम

आदेश दिया था कि, जिन लोगों को यहां से हटाया जाये उन्हें पुनर्वास के लिए लगभग 45 किलोमीटर दूर स्थित सावदा घेवरा की कॉलोनी में शिक्षा, परिवहन और स्वच्छता जैसी सुविधाओं की व्यवस्था के साथ रहने की जगह दी जाये, लेकिन मस्जिद और पुनर्वास के मामले में कानूनी प्रक्रिया अलग-अलग है।  

 

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खैर जो भी हो, लेकिन इस विवाद में मस्जिद की विरासत संबंधी पहचान सबस अहम है। NDMC की आधिकारिक वेबसाइट पर ‘Mosque and Campus, Race Course’ को अधिसूचित विरासत संपत्तियों में शामिल बताया गया है। जमीयत उलेमा का भी दावा है कि, 1977 के दिल्ली गजट में भी मस्जिद का जिक्र है। ऐसे में संगठन ने केंद्र सरकार से हस्तक्षेप करने और  इन रिकॉर्डों की जांच कर मस्जिद की ऐतिहासिक और कानूनी स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है।

नमाजियों को नहीं मिल रहा पानी तकRace Course Mosque

 वहीं राज्य सरकार का दावा है कि, मस्जिद सरकारी जमीन पर बनी है। ऐसे में अब विवाद मस्जिद के धार्मिक उपयोग का ही नहीं जमीन के स्वामित्व, वक्फ की स्थिति और विरासत संबंधी सरकारी रिकॉर्ड का भी है, जिसका स्पष्ट होना बेहद जरूरी हो गया बल्कि है।

19 अक्टूबर को मिले सरकारी नोटिस के बाद से गरमाए मामले को लेकर मस्जिद के इमाम मोहम्मद हारून का कहना है कि, परिसर में पानी और बिजली की आपूर्ति बंद कर दी गई है। इतना ही नहीं मस्जिद तक पहुंचने के रास्ते भी बंद कर दिए गए हैं, जिससे मस्जिद आने वाले नमाजियों को पीने का पानी तक नहीं मिल पा रहा है।  हारून का आरोप है कि, उन्होंने इस मामले को बीते छह महीने में कई बार दिल्ली वक्फ बोर्ड के सामने उठाया लेकिन कोई मदद नहीं मिल पाई। 

वक्फ बोर्ड ने नहीं लिया एक्शन

उन्होंने बताया कि, बोर्ड ने इस पूरे मामले पर  NDMC को पत्र लिखकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली, जबकि कोर्ट जाकर प्रभाव कार्रवाई की गई होती, तो आज शायद मस्जिद का ये हाल नहीं होता। इमाम मोहम्मद हारून का ये भी दावा है कि, वर्ष 2021 में जब सर्वे हुआ था तब रेस कोर्स मस्जिद को न तो अनधिकृत निर्माण बताया गया था और न ही अतिक्रमण के रूप में चिह्नित किया गया था। ये दावा उन्होंने बाकायदा एक वीडियो संदेश जारी कर किया है। 

 

वीडियो में उन्होंने वक्फ बोर्ड पर भी निष्क्रियता का आरोप लगाया और कहा जिस संस्था पर मस्जिद की देखरेख और हितों की रक्षा की जिम्मेदारी थी, उसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया। अब हारून कि, उम्मीद अन्य मुस्लिम संगठनों और मुस्लिम समुदाय से है। उन्होंने लोगों से मस्जिद को बचाने की अपील की है। मस्जिद को बचाने की मुहिम में शामिल हुए जमीयत उलेमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना मोहम्मद हकीमुद्दीन कासमी ने नेतृत्व में केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरण रिजिजू को एक ज्ञापन सौंपा गया और इस पूरे मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की गई है।

किरेन रिजिजू  को दिया ज्ञापन

Race Course Mosque

 यह ज्ञापन जमीयत के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी की ओर से दिया गया। ज्ञापन में मस्जिद की पुरानी स्थिति जैसे NDMC की विरासत सूची में नाम होना। 1977 के दिल्ली गजट में दर्ज होना और अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय की संशोधित सूची में होने का हवाला भी दिया गया है। जमीयत ने इन सभी मांगों को केन्द्रीय मंत्री के समक्ष रखा।

 साथ ही ये भी मांग की, कि मस्जिद और उससे लगे कब्रिस्तान को बेदखली या तोड़फोड़ की कार्रवाई से बचाया जाए। जब तक कानूनी विवाद हल नहीं हो जाता, तब तक मस्जिद को गिराने से बचाया जाए। दिल्ली वक्फ बोर्ड और NDMC से मामले की विस्तृत रिपोर्ट मंगाई जाए। मस्जिद की बिजली और पानी की आपूर्ति बहाल की जाए। नमाजियों को मस्जिद तक आने-जाने और नमाज अदा करने की सुविधा दी जाए।

ये है मस्जिद का इतिहास

 अब बात करते हैं रेस कॉर्ड मस्जिद से जुड़े इतिहास की, तो आपको बता दें कि, इसका निर्माण साल 1875 से 1900 के बीच हुआ था। ऐसे में ये कहा जा सकता है कि, ये मस्जिद 125 से 150 साल पुरानी है। हालांकि, इसे किसने बनवाया था इसे लेकर इतिहास के पन्नों में कोई पुख्ता जानकारी नहीं दर्ज है। हालांकि, उस दौर में ये इलाका अंग्रेजों द्वारा आधुनिक नई दिल्ली (लुटियंस दिल्ली) बसाए जाने से पहले का है। ऐसे में माना जाता है कि, इसे स्थानीय मुस्लिम आबादी या उस समय वहां रहने वाले स्थानीय निवासियों व मजदूरों ने नमाज़ पढ़ने के लिए बनवाया रहा होगा। किसी राजा या विशिष्ट ऐतिहासिक शासक का नाम इससे नहीं जुड़ा है।

 

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