
पोर्ट ब्लेयर। Horror Night: 20 साल पहले यानी 26 दिसंबर 2004 को तमिलनाडु में सुनामी की वजह से आई तबाही को लोग आज भी नहीं भूल पाए हैं। इस दैवीय घटना में 6,605 लोग मारे गए थे, जिसका दर्द आज भी लोग महसूस करते हैं। इसी तबाही के बीच सांपों से भरे जंगल में एक गर्भवती महिला नमिता ने अपने बेटे को जन्म दिया था, जिसका नाम उन्होंने सुनामी रखा। नमिता रॉय आज भी उस रात के दर्द और तकलीफ को याद कर कांप जाती हैं।
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बेटे का नाम रखा सुनामी
20 साल पहले तमिलनाडु में आई सुनामी से हुई तबाही का मंजर आज भी कई लोगों के जेहन में ताजा है। इस सुनामी से प्रभावित एक गर्भवती महिला ने सांपों से भरे जंगल में अपने बेटे को जन्म दिया। इसके बाद उन्होंने अपने बेटे का नाम सुनामी रखा। नमिता रॉय आज भी उस रात को याद कर सिहर उठती हैं।

पहाड़ी पर भागने लगे लोग
पश्चिम बंगाल के हुगली में रहने वाली नमिता रॉय बताती हैं कि 2004 में वह अपने परिवार के साथ अंडमान और निकोबार द्वीप हटबे में रहती थीं। वह 26 दिसंबर 2004 की आपदा को याद करते हुए कहती हैं कि मैं उस वक्त गर्भवती थी और उस दिन रोजमर्रा के काम में व्यस्त थी, तभी अचानक से मैंने देखा कि समुद्र की लहरें हटबे द्वीप की ओर बढ़ रही हैं और तेज़ झटके आ रहे हैं। लोग चिल्लाये और एक पहाड़ी की तरफ भागने लगे, तभी अचानक मैं बेहोश हो गई।

समुद्र की लहरों ने सब कुछ कर दिया बर्बाद
नमिता रॉय ने कहा कि जब मुझे जब होश आया तब मैं एक पहाड़ी जगंल में थी। यहां मेरे द्वीप के हजारों लोग थे। मेरे पति और बड़ा बेटा मुझे बेहोशी की हालत में यहां लेकर आए थे। मुझे बताया गया कि हमारा द्वीप समुद्री लहरों के कहर से नष्ट हो गया है। हमारा सब कुछ खत्म हो गया है। इस कहर के बीच रात करीब 23:49 बजे अचानक मुझे प्रसव पीड़ा शुरू हुई लेकिन आस-पास कोई डॉक्टर नहीं था।
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जंगल में था सांपों का आतंक
उन्होंने बताया कि प्रसव पीड़ा की वजह से मैं तड़पने लगी और पास की ही एक चट्टान पर लेट गई। मैं मदद के लिए जोर-जोर से चिल्ला रही थी, मेरे पति पूरी कोशिश कर रहे थे कि मुझे कोई मेडिकल मदद मिल जाये, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। इसके बाद उन्होंने जंगल के अंदर शरण लेने वाली कुछ महिलाओं से मदद मांगी। उन महिलाओं की मदद से मैंने जंगल में ही बेटे को जन्म दिया। नमिता कहती हैं कि उस जंगल में सांपों का आतंक था। उन्होंने ये भी बताया कि, जंगल में हम लोगों के पास खाने को भी कुछ नहीं था।

नारियल पानी पीकर जीवित रहे लोग
वहीं बच्चे के जन्मे देने की बाद हुए अत्याधिक रक्त स्राव से मेरी हालत बिगड़ने लगी। मैंने जैसे-तैसे अपने बेटे को दूध पिलाया और उसे जिन्दा रखने की कोशिश कर रही थी। जंगल के शरण लिए अन्य लोग भी नारियल पानी के सहारे ही जीवित रह रहे थे। हमने हट बे में लाल टिकरी पहाड़ियों पर चार रातें बिताईं। इसके बाद रेस्क्यू टीम वहां पहुंची और हम सबको बचाया, तब जाकर मुझे मेडिकल सुविधा मिली और पोर्ट ब्लेयर (जहाज पर) से जीबी पंत अस्पताल ले जाया गया।

कोविड में हुई पति की मौत
नमिता बताती हैं कि मेरे पति लक्ष्मीनारायण की कोविड-19 महामारी के दौरान मौत हो गई। अब मैं अपने दो बेटों सौरभ और सुनामी के साथ पश्चिम बंगाल के हुगली जिले में रहती हूं। मेरा बड़ा बेटा सौरभ एक निजी शिपिंग कंपनी में जॉब करता है। वहीं छोटा बेटा सुनामी अंडमान और निकोबार प्रशासन के लिए समुद्र विज्ञानी बनना चाहता है।
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