
नई दिल्ली। Waqf Bill: कांग्रेस ने कहा है कि वह जल्द ही वक्फ संशोधन विधेयक, 2025 की संवैधानिकता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी। यह विधेयक लोकसभा और राज्यसभा से पारित हो चुका है, लेकिन कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दलों ने इसे असंवैधानिक और मुस्लिम विरोधी बताते हुए इसका कड़ा विरोध किया है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा, ‘कांग्रेस बहुत जल्द वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024 की संवैधानिकता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी। हमें विश्वास है और हम मोदी सरकार द्वारा भारत के संविधान में निहित सिद्धांतों, प्रावधानों और प्रथाओं पर प्रहार करने वाले सभी हमलों का विरोध करना जारी रखेंगे।’
The INC’s challenge of the CAA, 2019 is being heard in the Supreme Court.
The INC’s challenge of the 2019 amendments to the RTI Act, 2005 is being heard in the Supreme Court.
The INC’s challenge to the validity of the amendments to the Conduct of Election Rules (2024) is being…
— Jairam Ramesh (@Jairam_Ramesh) April 4, 2025
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कांग्रेस सांसद का आरोप- बहुमत का हुआ दुरूपयोग

कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने विधेयक के पारित होने की आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि सरकार ने इसे लागू करने के लिए बहुमत का दुरुपयोग किया है। उन्होंने कहा, ‘अगर विधेयक को चुनौती दी जाती है, तो पूरी संभावना है कि न्यायपालिका इसे असंवैधानिक घोषित कर देगी।’ उन्होंने कहा, ‘इस विधेयक में सुधार कम और संदेह ज्यादा है, न्याय कम और पक्षपात ज्यादा है। यह विधेयक संविधान ने जो दिया है, उसे छीनने की कोशिश कर रहा है। इसे संशोधन कम और साजिश ज़्यादा कहा जाना चाहिए। जब कानून बराबर न हो, तो सत्ता की चालाकी बन जाती है। यह कानून नहीं, बल्कि कानूनी भाषा में लिपटी मनमानी है।
Excerpts from my speech on Waqf (Amendment) Bill, 2024:
इस बिल में सुधार कम, संशय ज़्यादा है; न्याय कम, पक्षपात ज़्यादा है। संविधान ने जो दिया, यह बिल वह छिननेकी कोशिश कर रहा है।इसको संशोधन कम, साज़िश ज़्यादा कहा जाना चाहिए।जब क़ानून बराबरी का ना हो तो वह सत्ता की चालाकी बन…
— Abhishek Singhvi (@DrAMSinghvi) April 3, 2025
हिन्दू मन्दिरों के पास भी काफी संपत्ति
कांग्रेस के पूर्व नेता और दिग्गज वकील कपिल सिब्बल ने गुरुवार को राज्यसभा में पूछा कि,’हिंदू मंदिरों के पास भी इतनी संपत्ति है, आप वहां क्या कर रहे हैं?” उन्होंने कहा, देशभर में वक्फ बोर्डों के पास कितनी जमीन और संपत्ति है, इस पर चर्चा होती है, लेकिन चार राज्यों में हिंदू धार्मिक संस्थानों के अधीन कुल क्षेत्रफल दस लाख एकड़ है। सिब्बल ने कहा, वक्फ बोर्ड एक वैधानिक बोर्ड है और इसके ज्यादातर मनोनीत सदस्य सरकार की ओर से होते हैं।
कमियों की ठीक करना चाहिए था

उन्होंने कहा, “इसमें सांसद, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जज, सिविल सेवक शामिल थे। अगर ये सरकारी नियुक्तियां थीं, तो कौन गलत कर रहा था? आपने इसे क्यों हटाया… फिर आप यह प्रावधान क्यों लाए? अगर कोई गलती हो रही थी, तो वह मुतवल्ली (वक्फ अधीक्षक) की ओर से हो रही थी। मुतवल्ली वक्फ के भीतर कोई न कोई डील कर लेते थे, जिसकी वजह से यह कुप्रबंधन हुआ। आपको इसे ठीक करना चाहिए था।”
संविधान के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन है
कांग्रेस का कहना है कि,यह विधेयक संविधान के कई मूल सिद्धांतों का उल्लंघन करता है। अनुच्छेद 25 हर व्यक्ति को धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है, जबकि अनुच्छेद 26 धार्मिक समुदायों को अपने धार्मिक संस्थानों के प्रबंधन का अधिकार देता है। कांग्रेस का दावा है कि वक्फ बोर्ड और सेंट्रल वक्फ काउंसिल में गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल करने का प्रावधान धार्मिक स्वायत्तता में दखल देता है। कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा, ‘अगर हिंदू मंदिरों या सिख गुरुद्वारों में गैर-हिंदू या गैर-सिख सदस्यों को शामिल करने की बात होती है, तो क्या यह स्वीकार्य होगा? फिर वक्फ में ऐसा क्यों है?’
समानता के अधिकार पर खतरा
अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार को भी खतरे में बताया जा रहा है। विपक्ष का तर्क है कि यह विधेयक विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय को लक्षित करता है, जो भेदभावपूर्ण है। विधेयक में ‘वक्फ बाई यूजर’ (दीर्घकालिक उपयोग के आधार पर वक्फ संपत्ति की मान्यता) को हटाने का प्रावधान है, जिसे कांग्रेस ने ऐतिहासिक वक्फ संपत्तियों के लिए खतरा बताया। पार्टी का कहना है कि इससे 4 लाख से अधिक संपत्तियां प्रभावित होंगी। विधेयक कलेक्टर जैसे सरकारी अधिकारियों को वक्फ संपत्तियों के स्वामित्व पर अंतिम निर्णय देने का अधिकार देता है, जो पहले वक्फ न्यायाधिकरण के पास था।
केंद्र ने आरोपों को किया ख़ारिज

कांग्रेस इसे कार्यपालिका द्वारा न्यायिक शक्तियों पर कब्जा करने का प्रयास मानती है। केंद्र सरकार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि, यह विधेयक मुस्लिम समुदाय के हित में है और इसका उद्देश्य वक्फ व्यवस्था में पारदर्शिता लाना है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में बहस के दौरान कहा, ‘विपक्ष वोट बैंक की राजनीति के लिए भ्रम फैला रहा है। यह विधेयक मुसलमानों के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करता है, बल्कि वक्फ संपत्तियों के दुरुपयोग को रोकता है।’ अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने भी दावा किया कि यह विधेयक गरीब मुसलमानों, महिलाओं और वंचितों को सशक्त करेगा।
ये हो सकते हैं कानूनी अधिकार
संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक समुदायों को अपनी संस्थाओं के प्रबंधन का अधिकार है। गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति को इस अधिकार में हस्तक्षेप के रूप में देखा जा सकता है। वक्फ न्यायाधिकरण की शक्तियों को कलेक्टर को हस्तांतरित करना संविधान के तहत शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का उल्लंघन हो सकता है। विधेयक को केवल मुस्लिम समुदाय की संपत्तियों पर लागू करना अनुच्छेद 14 और 15 के तहत समानता और भेदभाव के निषेध के खिलाफ माना जा सकता है।
खतरे में ऐतिहासिक संपत्तियों की मान्यता

‘वक्फ बाय यूजर’ को हटाने से ऐतिहासिक संपत्तियों की मान्यता खतरे में पड़ सकती है, जिसे संविधान के तहत संरक्षित सांस्कृतिक अधिकारों का उल्लंघन कहा जा सकता है। यह कदम कांग्रेस के लिए राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। पार्टी लंबे समय से खुद को अल्पसंख्यकों और संविधान के रक्षक के रूप में पेश करती रही है। इस विधेयक को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देकर कांग्रेस न केवल मुस्लिम समुदाय के बीच अपनी साख बढ़ाने की कोशिश कर सकती है, बल्कि विपक्षी एकता को भी मजबूत कर सकती है। डीएमके ने भी गुरुवार को घोषणा की थी कि, वह इस विधेयक को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी, जिससे संकेत मिलता है कि, विपक्ष इस मुद्दे पर एकजुट हो सकता है।
कोर्ट में उठ सकते हैं ये सवाल
हालांकि, यह कदम जोखिम भरा भी है। अगर सुप्रीम कोर्ट सरकार के पक्ष में फैसला सुनाती है तो यह कांग्रेस और विपक्ष के लिए बड़ा झटका होगा। इसके अलावा, भाजपा इसे “मुस्लिम तुष्टिकरण” के रूप में पेश करके अपनी हिंदुत्व की राजनीति को और मजबूत कर सकती है। जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में आएगा, तो कई अहम सवालों पर बहस होगी। क्या वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिमों की नियुक्ति संविधान के तहत जायज है? क्या सरकारी हस्तक्षेप धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन करता है? और क्या यह बिल वाकई पारदर्शिता लाने के लिए है या इसके पीछे कोई राजनीतिक मकसद है? इन सवालों के जवाब न केवल इस बिल का भविष्य तय करेंगे, बल्कि भारत की धर्मनिरपेक्षता और संवैधानिक मूल्यों की व्याख्या को भी प्रभावित करेंगे।
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