
Story Of Mahabharata: महाभारत में द्रौपदी के चीरहरण की घटना ऐसी है जिसकी आज के समय यानी कि कलियुग में भी घोर निंदा की जाती है। हस्तिनापुर के राज महल में दुर्योधन और शकुनि ने पांडव भाइयों को पासों के खेल यानी चौसर में ऐसा फंसाया कि वो उससे बाहर नहीं निकल सके और हार गये। चौसर का ये खेल पांडवों की पत्नी द्रौपदी के भरी सभा में अपमान के साथ खत्म हुआ। द्रौपदी का ये अपमान महाभारत के युद्ध की एकमात्र वजह बना।
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चौसर के खेल में हारे पांडव

बता दें कि, इस चौसर के खेल में पांडव अपना सबकुछ हार चुके थे। वे महल में सर्वहारा बनकर सिर झुकाए बैठे थे, उसी समय उनकी पत्नी द्रौपदी को उनकी आंखों के सामने घसीटकर महल में लाया गया और चिर हरण किया गया। आइए विस्तार से जानते हैं महाभारत की वो घटना जब पांच पांडवों की पत्नी द्रौपदी ने उनके जीते जी अपनी मांग का सिंदूर पोंछने की कोशिश की थी।
द्रौपदी को लगाया दांव पर
जुआ एक ऐसी बुरी लत है, जो व्यक्ति की बुद्धि हर लेती है। ऐसा ही कुछ बुद्धिमान, साहसी और पराक्रमी माने जाने वाले पांडवों के साथ हुआ। धर्मराज युधिष्ठिर सहित पांडव भाइयों ने अपनी पत्नी द्रौपदी को भी किसी वस्तु की भांति दांव पर लगा दिया। सब कुछ वापस पाने की लालच में पांडवों ने द्रौपदी को दांव पर लगाया, लेकिन दुर्भाग्य वश वे उन्हें भी हार गये।
गुस्से में लाल हुईं द्रौपदी

इसके बाद दुर्योधन ने अपने भाई दुशासन को द्रौपदी को महल में लाने का आदेश दिया। दुशासन जब जबरदस्ती द्रौपदी के कक्ष में पहुंचा तो वह बहुत गुस्सा हुईं। इसके बाद, जब द्रौपदी को पांडवों और कौरवों के बीच चल रहे खेल के बारे में पता चला तो ये सुनकर द्रौपदी को और भी ज्यादा गुस्सा आया और पीड़ा हुई।
कहा- पांडवों का मुझ पर अधिकार नहीं
जब द्रौपदी ने सुना कि, उनके पतियों ने उन्हें किसी वस्तु की भांति जुए ने दांव पर लगा दिया गया है, तो उन्होंने दुशासन से कहा- “पांडव भाइयों ने अपनी मर्जी से यह खेल खेला है, मैं इस खेल में किसी भी तरह से भागीदार नहीं हूं, ऐसे में मेरे जीतने या हारने का सवाल ही कहां उठता है? साथ ही, यदि पांडव भाई अपना सब कुछ हार चुके थे और कौरवों के दास बन गए थे, तो मुझ पर उनका अधिकार कहां रह गया था?
दुशासन ने बाल पकड़ कर घसीटा

नैतिकता से अलग, यदि हम खेल के नियमों को भी देखें, तो उन्हें मुझे दांव पर लगाने का कोई अधिकार नहीं था। मैं राजमहल में नहीं आऊंगी।” दुशासन के पास द्रौपदी के इन सवालों का कोई जवाब नहीं था, लेकिन उसे अपने भाई के आदेश का पालन करना था। ऐसे में उसने द्रौपदी के सवालों को नजरअंदाज कर दिया और उनके बालों को पकड़कर घसीटते हुए राज दरबार में ले आया।
सिर झुककर खड़े रहे वरिष्ठ जन
द्रौपदी को जैसे ही राज दरबार में लाया गया, दुर्योधन के हृदय की क्रूरता बाहर आ गई और उसने दुशासन को आदेश दिया कि वह द्रौपदी के वस्त्रहरण करके उन्हें अपनी जांघ पर बैठाये। दुर्योधन की यह बेशर्मी देखकर पांडव क्रोधित ही उठे, लेकिन कुछ भी बोलने की स्थिति ने नहीं थी। वहीं सभा में मौजूद जिसने भी यह बात सुनी, वह सब दंग रह गये, लेकिन किसी ने भी दुर्योधन के खिलाफ बोलने की जहमत नहीं उठाई। सभा में उपस्थित सभी बुजुर्ग सिर झुकाकर चुपचाप खड़े रहे।
श्री कृष्ण ने बचाई लाज

दुशासन ने अपने भाई की आज्ञा का पालन करते हुए द्रौपदी का चीरहरण करना शुरू किया, लेकिन किसी को भी द्रौपदी की तकलीफ नहीं दिख रही थी। थक हार कर द्रौपदी ने भगवान कृष्ण को पुकारा। देवी द्रौपदी की पुकार सुनकर कृष्ण अदृश्य रूप से प्रकट हुए और उन्होंने साड़ी को इतना लंबा कर दिया कि दुशासन निढाल हो गया, लेकिन द्रौपदी का लाज बरकरार रही।
क्रोध और पीड़ा से रोने लगीं द्रौपदी
इतना अपमान सहने के बाद द्रौपदी अपना धैर्य खो बैठीं। क्रोध और पीड़ा से भरी द्रौपदी ने कौरवों को ही नहीं, बल्कि अपने पांचों पतियों को भी खूब खरी-खोटी सुनाई। पांचाल देश की राजकुमारी द्रौपदी ने क्रोध में कहा- “जिस स्त्री के पांच पति हों और वह इस तरह अपमानित हो, उसे कोई सुरक्षा न मिले, तो वह किससे न्याय की उम्मीद करेगी? इस राजघराने के वरिष्ठों से? जो सबकुछ देखकर भी चुपचाप खड़े हैं?” यह सब कहते-कहते द्रौपदी क्रोध और पीड़ा से रोने लगी।
राज दरबार पहुंचीं कुंती-गांधारी
सारी उम्मीदें खो चुकीं द्रौपदी पांच पतियों की पत्नी होने के बाद भी खुद को अकेला महसूस कर रही थीं। द्रौपदी इतने गुस्से और दर्द से भर गईं कि, वह पांडवों को श्राप देते हुए अपनी मांग का सिंदूर पोंछने लगीं, लेकिन तब तक द्रौपदी के अपमान की खबर हर जगह फैल चुकी थी। इसकी सूचना मिलते ही कुंती और गांधारी भी राजदरबार में पहुंच गई और द्रौपदी को ऐसा करने से रोका।
कौरवों को मारकर लिया प्रतिशोध

इसके साथ ही कुंती और गांधारी ने इस अन्याय के लिए क्षमा मांगी। कुंती ने द्रौपदी से कहा- “तुम्हारा यह सिंदूर ही तुम्हें न्याय दिलाएगा। अपने पांचों पतियों से न्याय मांगो। वे तुम्हें न्याय दिलाएंगे।” अंत में कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में पांचों पांडवों ने दुर्योधन और दुशासन सहित सभी कौरव भाइयों को मारकर द्रौपदी के अपमान का बदला लिया और न्याय किया।
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