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Arun Khetrapal: कौन थे लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल, जिन्होंने 21 साल की उम्र में तबाह कर दिए थे पाक के 10 टैंक, अब बन रही फिल्म

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Arun Khetrapal

Arun Khetrapal: फिल्म ‘आर्चिज’ से इंडस्ट्री में डेब्यू करने वाले अमिताभ बच्चन के नाती अगस्त्य नंदा जल्द ही मशहूर निर्देशक श्रीराम राघवन के डायरेक्शन में बनने वाली वॉर ड्रामा  फिल्म ‘इक्कीस’ में नजर आने वाले है। वे इस फिल्म अभिनय करने को तैयार हैं। मेकर्स ने इस की फिल्म की रिलीज डेट का भी ऐलान कर दिया है। ये फिल्म 2 अक्टूबर 2025 को गांधी जयंती पर रिलीज की जाएगी। अभी फिल्म का एक मोशन पोस्टर रिलीज किया गया, जिसमें फिल्म की कहानी की झलक दिखाई गई। सोशल मीडिया पर फिल्म का टीजर रिलीज किया गया है, जो फैंस को बेहद पसंद आ रहा है। वे अगस्त्य पर जमकर प्यार लुटा रहे हैं।

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लड़ते-लड़ते दे दी थी कुर्बानी

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फिल्म ’21’ साल 1971 में हुए भारत पाकिस्तान युद्ध में दुश्मन देश को धूल चटाने वाले बहादुर सेकेंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल की असल जिन्दगी पर आधारित है। बता दें कि अरुण खत्रपाल परमवीर चक्र पाने वाले सबसे कम उम्र के योद्धा थे। उन्होंने भारत-पाकिस्तान के इस युद्ध में लड़ते-लड़ते अपने देश के लिए कुर्बानी दे दी थी।    सबसे कम उम्र में परमवीर चक्र प्राप्त करने वाले सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल को 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान उनकी बहादुरी के लिए याद किया जाता है। अरुण का जन्म 14 अक्टूबर 1950 को पुणे, महाराष्ट्र में एक पंजाबी हिंदू खत्री परिवार में हुआ था। वे भारतीय सेना में इंजीनियर्स कोर के अधिकारी थे।

 

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परमवीर चक्र से किया गया सम्मानित

अरुण के परिवार का सैन्य सेवा का इतिहास काफी लंबा रहा है। उनके दादा प्रथम विश्व युद्ध में लड़े थे। वहीं, उनके परदादा ने सिख खालसा सेना में अपनी सेवाएं दी थी। अरुण अपने परिवार से चौथी पीढ़ी के सैन्य अधिकारी थे, जो 1971 में हुए भारत पाकिस्तान युद्ध के दौरान बसंतर की लड़ाई में वे शहीद हो गए थे। उस वक्त अरुण की उम्र मात्र  21 वर्ष थी।  सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल भारतीय सेना में अधिकारी थे। दुश्मन का सामना करने में उन्होंने जो वीरता दिखाई, उसके लिए उन्हें भारत के सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था।

अकेले ही संभाला मोर्चा 

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1971 की भारत-पाकिस्तान की लड़ाई के दौरान 17 पूना हॉर्स को भारतीय सेना की 47वीं इन्फैंट्री ब्रिगेड की कमान सौंपी गई थी। अरुण खेत्रपाल पाकिस्तानी सेना से भिड़ गए और सीधे पाकिस्तानी हमले में शामिल हो गए। वे अपने सैनिकों के साथ अपने टैंकों से दुश्मन को कड़ी टक्कर दे रहे थे और उन्हें कुचलने में सफलता पाई। हालांकि, इस हमले में उनका साथ दे रहे एक अन्य टैंक के कमांडर की मौत हो गई, लेकिन इससे अरुण घबराए नहीं। वे अकेले ही मोर्चा संभालते हुए आगे बढ़ते गये और दुश्मन के गढ़ों को नेस्तनाबूद करते गये। अरुण ने बहुत बहादुरी से दुश्मन का मुकाबला किया।

घायल होने के बावजूद नहीं छोड़ा टैंक

उन्होंने आगे बढ़ रहे पाकिस्तानी सैनिकों और टैंकों पर बेतहाशा हमले किये। उन्होंने एक पाकिस्तानी टैंक को तबाह कर दिया। इसके बाद पाकिस्तानी सेना ने जवाबी हमला किया। इस हमले का सामना लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल ने अपने दो बचे हुए टैंकों के साथ किया और भीषण लड़ाई लड़ी। हालांकि, इस संघर्ष में लेफ्टिनेंट अरुण को भारी कीमत चुकानी पड़ी क्योंकि वह दुश्मन की गोलीबारी में गंभीर रूप से घायल हो गए थे, लेकिन उन्होंने अपना टैंक नहीं छोड़ा।

सर, अभी मेरी बंदूक काम कर रही है

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अरुण ने एक आखिरी टैंक को नष्ट करने के लिए लड़ाई लड़ी। युद्ध के आखिर में जब उनके सीनियर अधिकारी ने उन्हें जलता हुआ टैंक छोड़ने का आदेश दिया, तो रेडियो पर अरुण के अंतिम शब्द, जो सुनाई पड़े थे, वह थे, ‘नहीं सर, मैं अपना टैंक नहीं छोड़ूंगा। मेरी में बंदूक अभी भी काम कर रही है और मैं इन बदमाशों को पकड़ लूंगा।’ बाद ने वे इस युद्ध में वे शहीद हुए, लेकिन तब तक उन्होंने पाकिस्तान की 10 टैंकों को नष्ट कर दिया था।

 

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