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Israel–Iran Conflict: इजराइल-ईरान की तनातनी से बढ़ी विश्व युद्ध की आशंका, ये देश तय करेंगे रुख

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Israel–Iran Conflict:

नई दिल्ली। Israel–Iran Conflict: मिडिल ईस्ट में एक बार फिर तनाव चरम पर है। पहले इजराइल-हमास युद्ध, फिर इजराइल-हिजबुल्लाह युद्ध और अब इजराइल और ईरान आमने-सामने आ गये हैं। इजराइल ने गत गुरूवार 12 जून को देर रात ईरान के नतांज परमाणु संयंत्र और अन्य सैन्य ठिकानों पर हमला किया और वहां भारी तबाही मचाई। इस हमले में ईरान के कई परमाणु वैज्ञानिक और अधिकारी मारे गए। इजराइली हमले के जवाब ने ईरान ने भी 100 शाहेद-136 ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइलें दागी। हालंकि, ईरान की मिसाइलों को इजराइली डिफेन्स सिस्टम यानी कि आयरन डोम ने इंटरसेप्ट कर हवा में ही नष्ट कर दिया। इजराइल और ईरान के बीच छिड़े इस युद्ध को लेकर वैश्विक समुदाय चिंतित हो उठा है। साथ ही तीसरे विश्वयुद्ध की आशंका भी प्रबल हो गई है।

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बढ़ सकता है युद्ध का दायरा

Israel–Iran Conflict

एक्सपर्ट्स का मानना है कि, अगर रूस और चीन इस युद्ध में किसी भी तरह से शामिल होते हैं, तो विश्व युद्ध होने का खतरा बढ़ जायेगा। दरअसल, रूस और चीन दोनों ही ईरान के सहयोगी देश हैं और अगर वे ईरान को किसी भी तरह की सैन्य सहायता देते हैं, तो युद्ध का दायरा बड़ा हो सकता है और विश्व समुदाय के लिए खतरा बन सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि, यदि अगले 72 घंटे में हालात को काबू में न आये, तो 30 से 40 परसेंट संभावना है कि विश्व युद्ध हो सकता  है।

रूस ने की निंदा

गौरतलब है कि, गुरुवार को इजराइल द्वारा ईरान पर किये गये हमले की रूस ने तीखी निंदा की थी और इसे अंतर्राष्ट्रीय क़ानून का उल्लंघन बताया था। क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने  इस हमले पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए चेतावनी दी थी कि, इससे पूर्ण युद्ध हो सकता है।

बता दें कि, रूस-यूक्रेन युद्ध में रूस ने ईरान का शाहेद-136 ड्रोन का इस्तेमाल किया है। वहीं, रूस ने  ईरान को एस-300 वायु रक्षा प्रणाली दी है। ऐसे में अगर रूस, ईरान को और हथियार या फिर सैन्य सहायता भेजता है, तो संघर्ष बढ़ने की आशंका बढ़ सकती है। दरअसल,  ईरान की सहायता करके रूस मिडिल ईस्ट में अमेरिकी प्रभाव को कम करना चाहता है।

ईरान के साथ आ सकता है चीन

 रूस के अलावा चीन ने भी ईरान पर हुए इजराइली हमले की कड़ी निंदा की थी और इसे मध्य पूर्व में अस्थिरता फैलाने वाला कदम बताया था। इससे पहले चीन, ईरान के साथ 400 अरब डॉलर का ऊर्जा समझौता कर चुका है और उसे “रणनीतिक साझेदार” मानता था। हालांकि, चीन ने अभी तक ईरान को किसी भी तरह की सैन्य सहायता देने से इनकार कर दिया है, लेकिन वह उसे आर्थिक सहायता दे सकता है।

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अगर चीन ने ईरान को आर्थिक सहायता दी, तो ये युद्ध लंबा खिंच सकता है। दरअसल, ईरान के साथ युद्ध में खड़ा  होकर चीन मध्य पूर्व में अपने तेल और गैस हितों को सुरक्षित रखना चाहता है। उसका मानना है कि, मिडिल ईस्ट में अगर इज़राइल-अमेरिका गठबंधन मजबूत हुआ, उसके हितों के लिए खतरनाक हो सकता है।

जॉर्डन और अरब देश

एक्सपर्ट्स का मानना है कि, अगर इजराइली हमलों को न रोका गया, तो जार्डन ईरान के साथ आ सकता है और युद्ध में शामिल हो सकता है। इससे पहले जॉर्डन ने ईरान के ड्रोन को रोकने में मदद की थी। इधर, सऊदी अरब और यूएई तटस्थ रहना चाहते हैं। तुर्की ने भी दोनों देशों (ईरान और इजराइल) के बीच मध्यस्थता की पेशकश की थी, लेकिन इजराइल के साथ उसके सबंध पहले से ही तनावपूर्ण हैं। इधर, भारत ने दोनों देशों से शांति की अपील की है। साथ ही अपने नागरिकों को मध्य पूर्व से वापस लौटने को कहा है।

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 युद्ध के जोखिम

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जानकारों का मानना है कि, अगर इजराइल-ईरान युद्ध लंबा खिंचा, तो तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं और 100 डालर प्रति बैरल के ऊपर जा सकती हैं, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था बुरी तरह से डगमगा जाएगी। इसके अलावा अगर ईरान ने परमाणु हथियारों का इस्तेमाल कर दिया, तो तबाही आ सकती है। हालांकि इसकी संभावना बेहद कम है।

कब शुरू होता है विश्व युद्ध

आपको बता दें कि, विश्व युद्ध किन परिस्थितियों में शुरू होता है। जब किसी युद्ध में एक साथ कई देश शामिल हो जाते हैं, तो इसे विश्व युद्ध माना जाता है। जैसे कि इजराइल-ईरान के बीच चल रहे संघर्ष में अन्य सहयोगी देश शामिल हो जाएं। मान लीजिये, अगर इजराइल, ईरान पर हमले तेज करता है, तो उसका साथ देने के लिए चीन, रूस, मिस्र और तुर्की समेत अन्य सहयोगी देश उसका साथ देने के लिए युद्ध मैदान में आ जाएं और अगर ईरान इजराइल पर ड्रोन अटैक करता है, तो इजराइल का साथ देने के लिए उसका प्रमुख सहयोगी अमेरिका और अन्य यूरोपीय देश उसके साथ आ जाएं।  बता दें कि, मध्य पूर्व में यूएस के 40000 सैनिक तैनात हैं। ऐसे में अगर ईरान  इजराइल पर अधिक आक्रामक होने की कोशिश करता है, तो इस युद्ध में अमेरिका शामिल हो सकता है, जो नाटो को भी इसमें खींच सकता है।

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इधर, संयुक्त राष्ट्र संघ और यूरोपीय संघ ने दोनों देशों से शांति की अपील की है और दोनों देशों पर बातचीत की टेबल आने का दबाव बना रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी गुरुवार को ईरान पर किये इजराइली हमले की तीखी निंदा की थी और शांति वार्ता की अपील की थी।

हालिया घटनाक्र

उल्लेखनीय है कि, बीते 12 जून को देर रात इजराइल ने ईरान के नतांज पर बंकर-बस्टर बमों से हमला किया। इस हमले में ईरान के 6 परमाणु वैज्ञानिकों की मौत हो गई।  इस हमले से ईरान का परमाणु कार्यक्रम कम से कम एक से दो साल तक पीछे हो सकता है।  ईरान ने इसे अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया और आतंकवादी हमला करार दिया। इजराइल के हमले का जवाब देते हुए ईरान ने उस पर 100 शाहेद-136 ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। हालांकि, जॉर्डन और इज़रायली वायु सेना ने इनमें से कई को हवा में ही नष्ट कर दिया, लेकिन कुछ ड्रोन और मिसाइलें तेल अवीव पर गिरी भी हैं।

 

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