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Azmer Sharif Dargah: अजमेर शरीफ दरगाह पर शिव मन्दिर होने का दावा, ASI को जारी हुआ नोटिस

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अजमेर। Azmer Sharif Dargah: उत्तर प्रदेश के संभल जिले में शाही जामा मस्जिद की जांच को लेकर मचा बवाल अभी थमा भी नहीं है कि राजस्थान के अजमेर का नाम अचानक सुर्खियों में आ गया है। इसकी वजह है अजमेर शरीफ दरगाह से जुड़ी याचिका। राजस्थान की एक जिला अदालत ने बुधवार 7 नवंबर को अजमेर शरीफ दरगाह की जांच की मांग वाली याचिका पर अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और अजमेर दरगाह समिति को नोटिस जारी किया है।

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कोर्ट ने एएसआई को जारी किया नोटिस

Azmer Sharif Dargah

याचिकाकर्ता का दावा है कि अजमेर शरीफ दरगाह पर पहले शिव मंदिर था, जिसे तोड़कर दरगाह बनाई गई है। कोर्ट द्वारा इस संबंध में एएसआई को नोटिस जारी होने के साथ ही अब इस बात की चर्चा तेज हो गई है कि जल्द ही यहां का भी सर्वे हो सकता है। याचिकाकर्ता, हिंदू सेना के अध्यक्ष विष्णु गुप्ता ने एक बातचीत में बताया कि अजमेर शरीफ दरगाह काशी और मथुरा के समान मंदिर है। आइए जानते हैं क्या है ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती दरगाह और कौन थे ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती जिनकी याद में इसे बनाया गया था।

भारत ने कब आये थे ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती 

दरअसल, ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती फारसी मूल के सुन्नी मुस्लिम दार्शनिक और धार्मिक विद्वान थे। उन्हें ग़रीब नवाज़ और सुल्तान हिंद के नाम से भी जाना जाता था। कहा जाता है कि ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती 13वीं शताब्दी में भारतीय उपमहाद्वीप आये और राजस्थान के अजमेर में रहने लगे। यहां रहने के दौरान उन्होंने सुन्नी इस्लाम के चिश्ती संप्रदाय की स्थापना की और उसका प्रसार किया। अजमेर में जिस दरगाह पर हर दिन हजारों-लाखों लोग आते हैं वह ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह है।

सूफी का मतलब 

जानकर बताते हैं कि ‘सूफ़ी’ शब्द अरबी शब्द ‘सफ़’ से आया है। इसका मतलब है, ऊन से बने कपड़े पहनने वाला। इस शब्द की एक अन्य संभावित उत्पत्ति ‘सफ़ा’ है, जिसका अरबी में अर्थ ‘पवित्रता’ भी है। सूफी सुलह-ए-कुल यानी शांति और सद्भाव में विश्वास करते हैं। यहां की पीरी-मुर्शिदी परंपरा भारत की गुरु-शिष्य परंपरा के समान है।

कौन हैं ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती

इतिहासकारों के अनुसार ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती का जन्म 1143 ई. में ईरान के सिस्तान क्षेत्र में हुआ था। यह वर्तमान में दक्षिणपूर्वी ईरान में स्थित है। चिश्ती अपने पिता के कारोबार को छोड़ कर आध्यात्मिक मार्ग पर चल पड़े थे। इसी दौरान उनकी मुलाकात प्रसिद्ध संत हजरत ख्वाजा उस्मान हारूनी से हुई। कुछ दिनों बाद उन्होंने मोइनुद्दीन चिश्ती को शिष्य बना लिया और उन्हें शिक्षा दी। जब मोइनउद्दीन चिश्ती 52 वर्ष के थे तभी शेख उस्मान ने उनकी खिलाफत की। इसके बाद उन्होंने हज, मक्का और मदीना की यात्रा की। वहां से ये मुल्तान होते हुए भारत पहुंच गये।

मोइनुद्दीन चिश्ती अजमेर कब आये?

ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती 1192 ई. में अजमेर आये। कहा जाता है कि इसी समय मुहम्मद गोरी ने तराइन की दूसरी लड़ाई में पृथ्वीराज चौहान को हराया था और दिल्ली में अपना शासन स्थापित किया। चिश्ती के शिक्षाप्रद उपदेश सुनने के बाद स्थानीय लोग उनके प्रभाव में आने लगे। उनके अनुयायियों में राजा, महाराजा, अमीर और गरीब लोग शामिल थे। उनकी मृत्यु के बाद मुगल बादशाह हुमायूं ने वहां एक मकबरा बनवाया। मुहम्मद बिन तगलचक, शेरशाह सूरी, अकबर, जहांगीर, शाहजहां, दारा शिकोह और औरंगजेब जैसे शासकों ने अजमेर में उनकी दरगाह पर आकर जियारत की थी।

हर साल उर्स मनाया जाता है

हर साल ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की बरसी पर उर्स उत्सव मनाया जाता है। बता दें कि उनके निधन के दिन को लोग शोक के तौर पर नहीं बल्कि जश्न के रूप में मनाते हैं। इसका कारण यह है कि चिश्ती के अनुयायियों का मानना ​​है कि इस दिन शिष्य अपने ऊपर वाले गुरु यानी ईश्वर से फिर मिलता है।

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