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Teesri Kasam: फणीश्वर नाथ रेणु की ‘तीसरी कसम’: हीरामन-हीराबाई की अनकही प्रेम कहानी

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TEESRI KASAM

AJAY TIWARITeesri Kasam: तीसरी कसम गांव और कस्बे के बीच की कहानी है जिसमें ग्राम्य जीवन द्रष्टव्य है। रेणु जी ने ग्रामीण पृष्ठभूमि में आवागमन के साधन बैलगाड़ी, मेला, मनोरंजन, चैपाल, घाट, नदी के तीर, लोक कथाओं को तीसरी कसम में शामिल किया है। तीसरी कसम कहानी के साथ दो कथायें साथ-साथ चलती हैं। तीसरी कसम का चरम महुआ घटवारिन कहानी के उद्धरण के साथ पूरा होता है। तीसरी कसम हीरामन और हीराबाई की अधूरी प्रेम कहानी है जिसके नेपथ्य में महुआ घटवारिन की लोकगाथा है। महुआ घटवारिन को सौदागर खरीद लेता है तो तीसरी कसम की नायिका हीराबाई का अनुबंध एक नौटंकी वाली कम्पनी से रहता है।

हीरामन और हीराबाई का मौन प्रेम भावनाओं में पनपता है लेकिन इसकी परिणति बिलगाव पर पहुंचती है। तीसरी कसम का नायक गाड़ीवान हीरामन है तो उसी के गांव दूसरे गाड़ीवान लालमोहर, धुन्नीराम, पलटदास कहानी के पात्र हैं। कहानी में नेपाली गार्ड, कम्पनी के मैनेजर, दारोगा आदि भी हैं। कहानी का शीर्षक तीसरी कसम अर्थात कसमों

की संख्या तीन है जिसमें कहानी सिमटी हुई है। इससे पहले भी दो कसमें हुई हैं। नायक हीरामन गाड़ीवान है जो लदनी का काम करता है। बाजार, गांव, कस्बे से सामान लादता है और उससे हुई आमदनी से अपने परिवार का भरण-पोषण करता है। गाड़ीवान हीरामन के परिवार में उसके भैया और भाभी हैं। बचपन में हीरामन की शादी हुई थी। पत्नी की मौत होने के बाद उसका चेहरा भी उसे अब याद नहीं है।

हीरामन धन की लालच में चोरी का माल लादता था जिसमें उसे पैसे अधिक मिलते थे। मुनीम के कहने पर उसने चोरी का माल लादा लेकिन पुलिस वाले उसे पकड़ लेते हैं। ऐसे में वह अपने दोनों बैलों को बचा कर किसी तरह से भाग पाता है। कहानी के इसी सन्दर्भ में हीरामन पहली कसम खाता है कि अब चोरी का माल नहीं लादेगा। चोरी का माल लादने का खामियाजा हीरामन को अपनी बैलगाड़ी गंवाने से भुगतना पड़ता है। अब वह दूसरे की बैलगाड़ी में अपने बैल जोत कर लदनी करता है।

गाड़ीवाले को आधी कमाई देनी होती है। ऐसे में हीरामन और उसके परिवार का गुजारा नहीं हो है।दूसरी बार उसे बांस लादने को मिलता है। स्वाभाविक है कि बांस बैलगाड़ी से आगे और पीछे भी निकला होगा। एक लड़कियों के स्कूल के सामने गाड़ी के लदे बांस टकरा जाता है। कुछ लोग हीरामन को पीट देते हैं, जिससे हीरामन कसम खाता है कि अब कभी बांस नहीं लादेगा। दो कसमों के बाद तीसरी कसम में मारे गये गुलफाम की कहानी समायी है।

कम्पनी का मैनेजर ऐलान करता है कि बाघगाड़ी को मेले में पहुंचाना है, 100 रूपये मिलेंगे। कोई गाड़ीवान तैयार नहीं होता है, ऐसे में हीरामन तैयार हो जाता है। हीरामन मेले में बाघगाड़ी पहुंचा कर अपने लिये नयी बैलगाड़ी बनवाता है। अब हीरामन और उसके बैलों के परिश्रम की पुरी कमाई उसे मिलेगी। तीसरी कसम की कहानी यहीं से प्रारम्भ होती है। कम्पनी की बाई को चम्पापुर से फारबिसगंज मेले में पहुंचाना है। बाई का बक्सा ढोने वाले हीरामन से किराया तय करते हैं। परदे के पीछे नायिका हीराबाई मोलभाव करने से मना कर देती है।

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हीरामन की कुछ आदतें बड़ी ही स्वाभाविक है। रेणु जी लिखते हैं कि हीरामन की पीठ में गुदगुदी होती है तो वह गमछे से झार लेता है। हीरामन गांव का इतना भोला-भाला आदमी है कि उसे पता भी नहीं है कि उसकी बैलगाड़ी पर कौन बैठा है। उसने बस इतना देखा है कि इसमें काली साड़ी पहने कोई महिला, जनाना है। वह कुछ अपशकुन की डर से मंदिर में पूजा भी करता है लेकिन जब हीरामन परदे पीछे लेटी महिला को देखता है तो उसके मन की शंका खत्म हो जाती है। हीरामन की बैलगाड़ी एक बार हिचकोले खाती हैै तो वह बैलों को डांटता है कि ठीक से चलो बोरा नहीं लदा है। इससे यह दिखता है कि भावुक हीरामन अपने गाड़ी में बैठी महिला की बहुत इज्जत करता है। बैलों से भी उसका संवाद है जो अपनापन दर्शाता है।

बैलों को मारने पर हीराबाई रोकती है तो हीरामन को मधुर आवाज मोह लेती है। उसे भीनी सुगंध का एहसास होता है। यह प्रसंग हीरामन के सौन्दर्य पारखी नजर और उसकी नजाकत को प्रस्तुत करता है। इस बीच दोनों एक-दूसरे का नाम पूछते हैं। हीरामन और हीराबाई जब एक-दूसरे का नाम सुनते हैं तो हीराबाई कहती है कि अब तुम मीता हो। मीता का तात्पर्य मीत अर्थात मित्र से है। गाड़ीवान अपने देशी, गवंई लोकगीत के लिये जाने जाते हैं। हीरामन का गीत हीराबाई को बहुत पसन्द आता है। हीरामन के कहने पर हीराबाई उसे पुनः अच्छे अंदाज में सुनाती है। हीरामन खुश हो जाता है। इस दौरान हीराबाई उसे गुरू बोलती है। हीराबाई से हीरामन उसका गांव पुछता है तो हीराबाई कानपुर बताती है।

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कानपुर सुनते ही हीरामान ठहाके लगता है… कहता है तब का नाकपुर भी होगा। जब हीराबाई हां कहती है तो हीरामन हंसी से लोटपोट हो जाता है। हीराबाई बाई उसके शादी की बात पूछती है तो हीरामन बताता है कि उसकी भाभी अपनी बहन से कराना चाहती थी जिससे वह इनकार कर चुका है। हीरामन अपने भैया और भाभी को बहुत मानता है। यात्रा में धीरे-धीरे बैल थक जाते हैं। हीरामन एक नदी के किनारे गाड़ी रोकता है और बैलों को पानी पिलाता है। हीराबाई भी नदी में हाथ-मुंह धोकर आराम करती है। इस बीच हीराबाई हीरामन से अपनी बोली का गाना सुनने का प्रस्ताव करती है। कहानी में रेणु जी ने लोक परम्परा और लोकगीतों को बहुत ही मार्मिक अंदाज में प्रस्तुत किया है।

कहानी की नायिका कम्पनी की नांचने वाली बाई है लेकिन उसे स्थानीय बोली और भाषा के प्रति अगाध स्नेह है। वह लोकगीत सुनना चाहती है जिसमें गांव-गिरांव में बसता है। लोकगीत के लिये हीरामन नई लीक पकड़ता है और यहीं पर महुआ घटवारिन की कथा सुनाते हुए गाता भी है। महुआ की सौतेली मां उसे सौदागर के हाथ बेच देती है। रोती-विलखती, लाचार महुआ सौदागर के साथ नहीं जाना चाहती है। मौका पाकर नदी में छलांग लगा जाती है। महुआ की चाहत रखने वाला सौदागर का नौकर भी महुआ के साथ नदी में छलांग लगा देता है। हीराबाई को यह कथा बहुत पसन्द आती है। इसी रास्ते पर एक छोटे से गांव में हीरामन गाड़ी रोकता है और नास्ते के लिए दही और चुड़ा लाता है।

केले के पत्ते और मिट्टी के बर्तन हीराबाई को बहुत पसन्द आते हैं। हीरामन खाना परोसता है और दोनों साथ-साथ खाते हैं। यह गाड़ीवान और कम्पनी के बाई के बीच सादगी है जबकि हीरामन गाड़ीवान है और हीराबाई उसकी यात्री है। यह भी ध्वनित होता है कि गांव के गाड़ीवान पर अगाध विश्वास है कि वह महिला को सुरक्षित फारबिसगंज पहुंचायेेगा। फारबिसगंज मेले में पहुंचने पर हीरामन को पता चलता है कि वह कम्पनी की बाई को ले कर आया है। हीरामन को पांच अठनियां पास हीराबाई देती है और नौटंकी देखने का बुलाती है। हीरामन के गांव वाले गाड़ीवान भी साथ होते हैं। नौटंकी के दौरान हीराबाई को दर्शकों द्वारा अपशब्द कहे जाने पर हीरामन और उसके साथी भिड़ जाते हैं। इस दौरान मारपीट हो जाती है।

हीरामन को दारोगा भी मारते हैं। हीरामन को नहीं पसन्द है कि हीराबाई को कोई रंडी कहे। बीच-बचाव के बाद मामला शांत होता है। कम्पनी के लोग और दारोगा को हीरामन के भोलेपन का एहसास हो जाता है। 10 दिनों तक मेला पूरे शबाब पर रहता है और हीरामन रात को नौटंकी देखने आता है। अचानक उसको संदेश मिलता है कि स्टेशन पर हीराबाई उसका इंतजार कर रही है। स्टेशन पर पहुंचते ही हीराबाई हीरामन को एक बटुआ देती है जो हीरामन उसे रखने के लिए दिया था। हीरामन का बटुआ हीराबाई द्वारा रखा जाना, यह दोनों के बीच अपनापन का एहसास करा जाता है। हीरामन के मन और आंखों को देख कर हीराबाई समझ चुकी होती है। वह बोलती है मीता दिल छोटा मत करो। ये पैसे लो एक चादर अपने लिये खरीद लेना।

हीरामन नाराज हो कर बोलता है कि बार-बार पैसे की बात नहीं कीजिये। इतने में बक्सा ढोने वाला रेलगाड़ी चलने की बात कहता है। हीराबाई कहती है कि महुआ को सौदागर ने खरीद लिया है हीरामन। हीरामन दुखी मने से बैलगाड़ी के पास आता है और अपने बैलों को डांटता है कि क्या पीछे मुड़-मुड़ कर देख रहे हो। खाओ कसम कभी कम्पनी वाली बाई को नहीं बिठाओगे। इसी के साथ तीसरी कसम हीरामन की पूरी हो जाती है। महुआ घटवारिन और हीरामन-हीराबाई का प्रेम भावनाओं में रह कर जीवित किंवदन्ती बन जाती है। मारे गये गुलफाम, गुलफाम का तात्पर्य गुलाब से है। हीरामन कहानी के अंत में कहता है कि मारे गये गुलफाम जो स्वयं के प्रेम के लिए कहता है। मारे गये गुलफाम हीरामन के प्रेम और बलिदान का दर्शाता है।

तीसरी कसम रेणु की कहानी 1956 में लिखी गयी और इस कहानी पर फिल्म 1966 में बनी। इस फिल्म का निर्देशन बासु भट्टाचार्य ने किया। फिल्म का निर्माण शैलेन्द्र ने किया। राजकपूर-वहीदा रहमान अभिनीत इस फिल्म का संवाद, पटकथा रेणु ने ही लिखा। उन्होंने स्वयं की साहित्यिक कृति में पटकथा लिखते समय कुछ बदलाव भी किया। कहानी में महुआ घटवारिन कथा का दुनिया बनाने वाले, काहे को दुनिया बनाई, गाने में समेट दिया।

फिल्म में विक्रम सिंह जो हीराबाई को अपने अंदाज में चाहता है प्रस्तुत किया है लेकिन कहानी में ऐसा नहीं है। मेले का दृश्य, फिल्म के गाने बहुत दार्शनिक अंदाज में लिखे और फिल्माये गये हैं। सजन रे झूठ मत बोलो, पान खाय सइयां हमारो, लाली-लाली डोलिया में लाली से दुल्हनियां, अजी हां, मारे गये गुलफाम बहुत प्रसिद्ध हुए। कहानी की अपेक्षा का फिल्म का समापन बहुत अच्छे मिजाज में होता है।

रेणु जी की कहानी का कथानक पूरा ग्रामीण है, इसलिये स्थानीय बोली-भाषा, परम्परा, लोककथा, लोकगीत, पात्रों के नाम भी लोकजीवन से लिये गये हैं। तीसरी कसम यह संदेश में सफल रहती है कि गांव के गाड़ीवान हीरामन भोला-भाला है लेकिन वह मन से बहुत साफ है और दिल से हीराबाई के प्रति लगाव रखता है। कम्पनी की बाई को मेला में पहुंचाने के दौरान ही दोनों एक दूसरे के प्रति आत्मीय हो जाते हैं।

हीरामन के मुंह से निकले शब्दों में गांव की माटी की सुगन्ध तैर जाती है। हीराबाई भी उसकी सादगी पर मोहित हो जाती है लेकिन तीसरी कसम की प्रेम कहानी महुआ घटवारिन के फलक पर होता है। कहानी में स्थानीय शब्द होने की स्थिति में कुछ पाठकों के लिए की पठनीयता में कठिनाई साबित हो सकती है लेकिन फिल्म की पटकथा भी रेणु जी द्वारा ही लिखी गयी जो दर्शकों के लिए सधी हुई में आती है। उर्दू के शब्द भी हिन्दी प्रेमियों के लिए अपनेपन का एहसास करा जाते हैं। हीराबाई को मिस हीरादेवी, लैला, गुलबदन आदि नामों से मेले में नौटंकी का विज्ञापन करने वाले पुकारते हैं।

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