
नई दिल्ली। Iran–Israel Conflict: बीते दो साल से अधिक समय से अस्थिर हुआ मिडिल ईस्ट ऐसा लग रहा है कि, अब कभी भी स्थिर नहीं हो पायेगा क्योंकि इजराइल और ईरान के बीच चल रहे इस युद्ध में अब अमेरिका ने एंट्री ले ली है। जी हां, ईरान के परमाणु ठिकानों पर अब अमेरिका की तरफ से बमबारी की जा रही है, जिससे पश्चिम एशिया में तनाव और ज्यादा बढ़ गया है। ईरान-इजराइल युद्ध पर बेहद करीब से नजर रख रहे भारत के लिए ये स्थिति बिलकुल भी ठीक नहीं है।
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भारत ने अपनाई तटस्थता की नीति

दरअसल, भारत के ईरान और इजराइल दोनों से अच्छे संबंध हैं। ऐसे में अगर साथ देने के बात आएगी, तो उसके लिए फैसला लेना कठिन हो जायेगा कि, वह किसका साथ दे ईरान का या इजराइल का। भारत के लिए ये मामला कूटनीतिक, आर्थिक, रणनीतिक और मानवीय हितों से जुड़ा हुआ है। ऐसे में भारत चाह कर भी इस संघर्ष से पूरी तरह खुद को अलग नहीं कर सकता है। उधर, इस कठिन समय में ईरान और इजराइल दोनों को ही भारत से काफी उम्मीदें हैं। हालांकि, भारत ने अभी पूरी तरह से तटस्थता की नीति अपनाई है।
अमेरिका भी बरसा रहा बम
वहीं, इजराइल का साथ देने के लिए अब अमेरिका भी इस लड़ाई में कूद चुका है। वह, ईरान के परमाणु ठिकानों पर बराबर बमबारी कर रहा है। इससे पहले अमेरिका इजराइल को खुफिया जानकारी और मिसाइल सुरक्षा प्रणाली ही उपलब्ध करता था, लेकिन अब वह लड़ाई में भी कूद चुका है और ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमला करने के लिए बी-2 बमवर्षक विमानों का इस्तेमाल कर रहा है। इससे पता चल रहा कि, इजराइल ही नहीं बल्कि अमेरिका भी ईरान के परमाणु हथियारों के खिलाफ है।
पशोपेश में भारत

बता दें कि, इजराइल लंबे समय से ईरान के फोर्डो ‘जहां उसके परमाणु हथियार रखे हुए हैं’ वहां तक पहुंचने के लिए बेताब था, लेकिन उसके पास वहां तक पहुंचने की ताकत नहीं थी। रिपोर्ट्स के अनुसार, फोर्डो एक पहाड़ से करीब तीन सौ फीट नीचे स्थित है। ऐसे में अब अमेरिका का इजराइल के साथ खुलकर आना उसके लिए वरदान साबित होगा। अब इजराइल को ईरान के परमाणु हथियारों को खत्म करने में आसानी होगी, लेकिन ये स्थिति भारत को पशोपेश में डालने वाली वाली है। भारत के इजराइल से काफी अच्छे संबंध हैं। दोनों देशों के बीच रक्षा, खुफिया जानकारी और तकनीक का बराबर मात्रा में आदान-प्रदान होता है।
ईरान से भी हैं भारत के अच्छे संबंध
इजराइल के साथ ही भारत के संबंध ईरान के साथ भी काफी अच्छे हैं। दोनों देश एक महत्वपूर्ण आर्थिक और सांस्कृतिक भागीदार है। भारत ईरान से ऊर्जा (पेट्रोलियम और गैस) खरीदता है। साथ ही, चाबहार बंदरगाह भारत के लिए मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक पहुंचने का सबसे अहम रास्ता है। भारत ने इस बन्दरगाह पर बहुत बड़ा निवेश किया है। भारत ने हमेशा पश्चिम एशिया में सतर्कता बरती है और ‘मल्टी-एलाइनमेंट’ की नीति का पालन किया है। इसका मतलब है कि, उसने इजराइल, ईरान समेत अन्य खाड़ी देशों और अमेरिका जैसे परस्पर प्रतिद्वंद्वी देशों के साथ अपने संबंधों को मजबूत बनाया है, लेकिन अब अमेरिका के इस संघर्ष में शामिल होने से भारत मुश्किल में आ गया है। अब उसे अपनी नीति पर दोबारा से विचार करना पड़ सकता है।
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कमजोर हुआ ईरान

दूसरी तरफ, अमेरिका के युद्ध में कूदने से ईरान की स्थिति कमजोर होने लगी है। ईरान में एक सप्ताह के भीतर सैकड़ों लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि हजारों लोग बेघर हो चुके हैं। इसके साथ ही उसके कई परमाणु और सैन्य ठिकाने नष्ट हो गये हैं। कुछ रिपोर्ट्स की मानें, तो ईरान 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद भी इतना कमजोर नहीं हुआ था, जितना अभी वह खुद को महसूस कर रहा है। इजराइल इस समय ईरान को ही नहीं बल्कि उसके सभी सहयोगियों जैसे हिजबुल्लाह, हूती और हमास पर भी लगातार हमले कर रहा है, जिससे उन्हें भी भारी नुकसान हो रहा है। यहां तक कि, ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह खामेनई की पकड़ भी कमजोर होती हुई नजर आ रही है।
अमेरिका के आगे झुका पाकिस्तान
ऐसे हालात ने भारत में हमेशा तटस्थता की नीति अपनाई है। वह रूस-यूक्रेन युद्ध में भी तटस्थ है। अब उसे इजराइल-ईरान युद्ध में यही नीति अपनानी चाहिए। ख़ास बात ये है कि, भारत ने प्रत्यक्ष तौर पर अभी तक किसी की मदद नहीं की है। वह हालात पर बारीकी से नजर बनाये हैं, लेकिन पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान ऐसा नहीं कर पाया। ईरान से उसके सबंध ठीक होने के बावजूद उसने ईरान के खिलाफ अमेरिका को अपना क्वेटा एयरबेस इस्तेमाल करने दिया। इधर, भारत अगर चाहे, तो वह परिस्थितियों का फायदा उठाकर खाड़ी के देशों को पाकिस्तान के खिलाफ गोलबंद कर सकता है।
ऐसे प्रभावित होगा भारत

हालांकि, मिडिल ईस्ट में चल रहे इस सकंट से भारत अछूता नहीं है, क्योंकि खाड़ी और मध्य पूर्व एशिया में उसके 80 से ज्यादा लोग रहते हैं, जिनकी सुरक्षा जरूरी है। भारत बीते दो तीन दिनों 1400 से अधिक छात्रों को ईरान से निकाल चुका है। ऐसा ही उसे इजराइल में भी करना पड़ रहा है। इस संघर्ष की वजह से भारत की उर्जा सुरक्षा भी प्रभावित हो रही है। दरसल, भारत अपनी जरूरत का 60% फीसदी कच्चा तेज इसी क्षेत्र से आयात करता है। लगभग इसी मात्रा में गैस भी। ऐसे में अगर हालात और ज्यादा बिगड़ते हैं और युद्ध लंबा खिंचता है, तो आपूर्ति बाधित हो सकती है और इसकी कीमतें बढ़ सकती हैं, जिसका असर देश की आम जनता पर पड़ेगा। मिडिल ईस्ट के इस क्षेत्र में आई अस्थिरता से भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEEC) भी खतरे में पड़ सकता है।
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