
नई दिल्ली। Iran-Israel Ceasefire: ईरान की जनता पहले से ही खामेनई शासन के खिलाफ है। यहां के युवाओं और महिलाओं में उनके खिलाफ गुस्सा भरा हुआ है। दरअसल, साल 2022 में महसा अमीनी की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी। महसा को सरकारी मानकों के हिसाब से हिजाब न पहनने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद अस्पताल में उसकी मौत हो गई थी। महसा की मौत के खिलाफ ईरान की जनता सड़क पर उतर आई थी और जोरदार प्रदर्शन शुरू हो गया था, जिसने वहां की कठोर नीतियों और मानवाधिकारों के उल्लंघन को दुनिया के सामने ला दिया था। वहीं, अब ईरान-इजराइल युद्ध की वजह से भी वहां की जनता को काफी नुकसान उठाना पड़ा है, जिससे आशंका जताई जा रही है कि, जनता खामेनई का तख्तापलट करने का आह्वान कर सकती है।
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इजराइल की लिस्ट में था खामेनई का नाम

बता दें कि, ईरान-इजराइल के बीच सीजफायर हो गया है। इस युद्ध में उसके तीन न्यूक्लियर ठिकानों समेत कई सैन्य ठिकाने और सरकारी संस्थानों को नुकसान पहुंचा है। साथ ही उसकी सेना के कई टॉप अधिकारी और परमाणु वैज्ञानिकों को भी मार गिराया गया है। कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, इजराइल की लिस्ट में ईरान के परमाणु ठिकानों, परमाणु वैज्ञानिकों के साथ ही अयातुल्लाह खामेनई का नाम भी था, लेकिन अमेरिका के दखल के बाद खामेनई को मारने का प्लान इजराइल ने कैंसिल कर दिया, लेकिन ईरान के बदले हालात देखते हुए ऐसा लग रहा है कि, खामेनई की आगे की राह बिलकुल भी आसान नहीं होने वाली।
जनता में असंतोष
रिपोर्ट्स में बताया जा रहा है कि, ईरान के खिलाफ जारी जंग में इजराइल के समर्थन में अमेरिका के एंट्री लेते ही ईरान कमजोर पड़ने लगा। परिणाम स्वरूप ईरान के विदेश मंत्री दुनिया भर में घूम-घूम कर मदद की गुहार लगा रहे थे। साथ ही युद्ध रुकवाने के लिए भी गिड़गिड़ा रहे थे। इस हमले में एक हजार से अधिक ईरानियों की मौत हो गई है जबकि सैंकड़ों घायल हैं। इसके अलावा वहां के रिहायशी इलाकों से लेकर कई महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर को भारी क्षति पहुंची है। इन सबसे ईरान के लोगों में खामेनई शासन के प्रति काफी नाराजगी भर गई है और अंसतोष पैदा हो गया है।
खामेनई को हटाने की साजिश
बता दें, कि यहां तानाशाही का आलम ये है कि 86 साल के खामेनई के उत्तराधिकारी को लेकर भी अभी तक तस्वीर साफ़ नहीं है। ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि, अगर खामेनई को कुछ हो गया, तो यहां की सत्ता की बागडोर किसके हाथों में जाएगी। कुछ रिपोर्ट्स में ये भी दावा किया जा रहा है कि, ईरान के कुछ सैन्य अधिकारी, बिजनेसमैन और कुछ मौलवी खामेनई को सत्ता से हटाने योजना बना रहे हैं। ये भी कहा जा रहा है कि, यहां के उदारवादी समूह का मानना है कि, खामेनई की नीतियों की वजह से इजराइल ने ईरान पर हमले किये, जिससे आने वाले समय में देश आर्थिक संकट में फंस सकता है।
ईरान में नहीं है विपक्ष
हालांकि, ईरान में कोई ऐसी मजबूत विपक्षी पार्टी नहीं है, जो खामेनई शासन को सीधे तौर पर चुनौती दे सके, लेकिन आशंका है कि, कई गुट एक होकर उनके खिलाफ साजिश रच रहे हैं। कुछ साल पहले तक यहां मुजाहिदीन-ए-खल्क विपक्षी पार्टी के तौर पर मजबूत मानी जाती थी, लेकिन अब वह कमजोर हो चुकी है, इसके नेता जैसे कि रेजा पहलवी निर्वासित जीवन जी रहे हैं और उसके पास जन समर्थन का आभाव है, लेकिन ईरान-इजराइल जंग को लेकर रेजा की जो प्रतिक्रिया आई है, उसमें उन्होंने खामेनई की परमाणु हथियारों की महत्वकांक्षा को जिम्मेदार ठहराया।
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इस्तीफा दें खामेनई

रेजा ने खामेनई के इस्तीफे की मांग की है और कहा है कि, ईरान की शांति के लिए उनका अयातुल्लाह के पद से हटना जरूरी है। रेजा ने कहा, परमाणु हथियारों की महत्त्वकांक्षा ने ईरान को जंग में धकेल दिया। खामेनई ने परमाणु हथियारों की चाह को पूरी करने के लिए जनता के हितों को ताक पर रख दिया। पहलवी ने अपील की कि, खामेनई को बंकर से निकल कर जनता के सामने आना चाहिए और अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए, ताकि ईरान में शांति स्थापित हो सके। उम्मीद जताई जा रही है कि इस अपील के बाद रेजा को ईरान की जनता का साथ मिलेगा और खामेनई की बेदखली का रास्ता साफ होगा।
झेल रहा आर्थिक प्रतिबन्ध
बता दें कि, ईरान को परमाणु हथियारों की चाह की वजह से अमेरिका समेत कई पश्चिमी देशों के सख्त आर्थिक प्रतिबन्ध झेलने पड़ रहे हैं। तेल निर्यात में आई कमी, मुद्रास्फीति और बेरोजगारी ने यहां की जनता की कमर तोड़ दी है। कारोबारियों को लगातार डर सताता रहा कि, अगर जंग लंबे समय तक चली, तो सबसे ज्यादा नुकसान उन्हें उठाना पड़ेगा। यही वजह है कि, वे अब देश में शांति चाहते हैं। ऐसे में उम्मीद कि, खामेनई को सत्ता से हटाने वाले समूह को इनका पूरा साथ मिल सकता है। दरअसल, इजराइल के पीएम बेंजामिन नेतन्याहू भी स्पष्ट रूप से कह चुके हैं कि, खामेनई के सत्ता से हटने से जंग समाप्त हो सकती है। वह भी चाहते हैं कि, ईरान में परमाणु कार्यक्रम बंद होने के साथ ही सत्ता परिवर्तन हो जिससे शांति स्थापित हो सके।
किसी ने नहीं दिया ईरान का साथ

आपको बता दें कि, इजराइल बीते दो साल से अधिक समय से अपने दुश्मनों (हमास, हिजबुल्लाह, हूती और ईरान) के खिलाफ जंग छेड़े हुए है। वह हमास और हिजबुल्लाह को पूरी तरह से तबाह कर चुका है और अब ईरान पर अपनी निगाहें टेढ़ी किए हुए हैं। हालिया, ईरान-इजराइल युद्ध में किसी भी मुस्लिम या अन्य देश ने ईरान का साथ नहीं दिया और न ही किसी ने प्रत्यक्ष रूप से अमेरिका या इजराइल की आलोचना की। कुल मिलाकर ये भी कहा जा सकता है कि, ईरान के साथ दुनिया का कोई देश नहीं खड़ा हुआ। वह पूरी तरह से अकेला पड़ गया था।
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