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Shimla Agreement: देश के लिए जहर है शिमला समझौता, युद्ध जीत कर भी, बातचीत की टेबल पर क्यों हार गया था भारत?

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निशा शुक्ला 

नई दिल्ली। Shimla Agreement:  भारत की 1971 की जीत पर काला धब्बा बने शिमला समझौता को कोई भी भारतीय कभी नहीं भूल सकता है। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के साथ ये समझौता क्यों और किस दवाब में किया था, ये आज तक किसी की समझ में नहीं आया। इस समझौते ने पाकिस्तान पर हुई भारत की बड़ी जीत को भी हार जैसा एहसास करा दिया था। शिमला समझौते की वजह से कई उम्मीदें अधूरी रह गई थीं, जिसका खामियाजा आज भी भारत को भुगतना पड़ता है। आइए जानते हैं क्या है शिमला समझौता और कब हुआ था।

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दुनिया के नक्शे पर आया था बांग्लादेश

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साल 1971 में आज ही के दिन यानी 16 दिसंबर को उस भारत पाकिस्तान युद्ध का फैसला हुआ था, जिसने दुनिया के नक्शे पर एक नये देश का खाका खींचा था और वह देश था बांग्लादेश। जी हां इस देश को बनाने में भारत के कई वीर जवानों ने अपने प्राणों की आहूति दी थी और पाकिस्तान को घुटनों पर ला दिया था। इस युद्ध में भारत ने न सिर्फ पाकिस्तान के एक चौथाई क्षेत्र पर कब्जा कर लिया बल्कि 93 हजार सैनिकों को आत्म समर्पण करने के लिये मजबूर कर दिया था। इस युद्ध की जीत के साथ ही भारत को एक बड़ा मौका मिला था, जिसमें वह कश्मीर सहित कई मुद्दों पर अपने पक्ष में फैसला कर सकता था, लेकिन हुआ इसका उल्टा। जीत के बाद भी भारत, पाकिस्तान के सामने झुका जा रहा था।

भारत ने नहीं उठाया ठोस फायदा

1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध को बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के नाम से भी जाना जाता है। इसी युद्ध में पाकिस्तान के दो टुकड़े हुए थे और पूर्वी पाकिस्तान टूट कर स्वतंत्र बांग्लादेश बना था। ये भारत की अब तक की सबसे बड़ी जीत थी। इस युद्ध में पाकिस्तान को धूल चटाते हुए भारतीय सेना ने उसके 93, 000 सैनिकों को आत्म समर्पण करने के लिए मजबूर कर दिया था। साथ ही पाकिस्तान के लगभग 15,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को भी अपने कब्जे में ले लिया, लेकिन ये देश की सबसे बड़ी बदकिस्मती थी कि, 1971 के शिमला समझौते में भारत ने इस जीत का कोई ठोस लाभ नहीं उठाया और जीती हुई जमीन पाकिस्तान को बातचीत की टेबल पर सजा कर वापस कर दी।

इंदिरा गांधी ने किया युद्ध का ऐलान

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इस युद्ध में लाखों बंगालियों को मौत के घाट उतार दिया गया, जबकि करोड़ों लोगों ने जान बचाने के लिए भारत में शरण ली। ये भारत के लिए बड़ा मानवीय संकट होने के साथ ही बड़े खतरे की आशंका भी पैदा करने लगा, क्योंकि शरणार्थियों की संख्या एक करोड़ के करीब पहुंच गई थी। इसे देखते हुए भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से मदद की मांग की, लेकिन कोई भी देश उनकी मदद करने नहीं आया, तो उन्होंने युद्ध का ऐलान कर दिया, जो 13 दिनों तक चला।

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अमेरिका ने दिया पाकिस्तान का साथ

ये युद्ध भारतीय सेना ने पूर्वी पाकिस्तान की मुक्ति वाहिनी सेना के साथ मिलकर लड़ा और पाकिस्तानी सेना को धूल चटाते हुए आत्मसमर्पण के लिए मजबूर कर दिया। 16 दिसंबर 1971 वहीं खास दिन था, जब पाकिस्तानी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल ए.ए.के. नियाजी ने 93,000 सैनिकों के साथ ढाका (जो वर्तमान में बांग्लादेश की राजधानी है) में आत्मसमर्पण किया। इस  जीत में भारत ने पाकिस्तान के सिंध और पंजाब क्षेत्रों में महत्वपूर्ण क्षेत्रों जैसे चंब और शकरगढ़ पर कब्जा कर लिया। इस युद्ध में मिली हार के साथ ही पाकिस्तान दो टुकड़ों में विभाजित हो गया। इस युद्ध के दौरान अमेरिका और चीन पाकिस्तान के साथ खड़े थे।

भारत को मिला सोवियत संघ का साथ

अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने पाकिस्तान की मदद के लिए परमाणु हथियारों से लैस सातवें फ्लीट को बंगाल की खाड़ी की तरफ भेजा। वहीं, भारत को सोवियत संघ का साथ मिला, जिसके जहाजों में मैदान में आकर अमेरिका पर दबाव बना दिया और उसके फ्लीट को वापस लौटने पर मजबूर कर दिया। युद्ध के बाद भारत के पास मजबूत स्थिति थी, जैसे कि युद्धबंदी, कब्जा क्षेत्र और पाकिस्तान के टुकड़े करके बांग्लादेश की मान्यता, लेकिन 2 जुलाई 1972 में इंदिरा गांधी और पाकिस्तानी राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच हिमाचल प्रदेश के शिमला में हस्ताक्षरित समझौता हुआ, जो अब शिमला समझौते की नाम से जाना जाता है।

शिमला समझौते में है इन बातों का जिक्र

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इस समझौते का उद्देश्य युद्ध के बाद संबंधों को सामान्य बनाना था। इस समझौते का मूल था, कि दोनों देश अपने सभी विवादों को द्विपक्षीय वार्ता के माध्यम से हल करेंगे, संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों का पालन करेंगे और एक-दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता व संप्रभुता का सम्मान करेंगे। इसके अलावा इस समझौते में कुछ और खास बातों का भी जिक्र हुआ।

समझौते में ये भी तय हुआ कि दोनों देश अंतरराष्ट्रीय सीमा पर से अपनी सेनाओं को वापस बुलाएंगे। इस समझौते के तहत ही भारत ने पाकिस्तान के क्षेत्र से अपनी सेना वापस बुला ली, लेकिन कुछ रणनीतिक क्षेत्र जैसे तुर्तुक, धोथांग, त्याकशी और चालुनका (883 वर्ग किलोमीटर) को अपने पास रखा। युद्ध में बड़ी जीत मिलने के बाद भी भारत बातचीत की टेबल पर हार गया और पाकिस्तानी पीएम जुल्फिकार अली भुट्टो की बातों में आकर शिमला समझौता कर बैठा।

क्या थी इंदिरा गांधी की मजबूरी

एक रिपोर्ट के अनुसार भारत की तरफ़ से बातचीत करने वाली टीम के एक अधिकारी, केएन बख़्शी ने साल 2007 में दिए अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि, इस युद्ध में पाकिस्तानी सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया था, पूरी दुनिया की राय भारत के पक्ष में थी, फिर भी इस जीत का ज्यादा फायदा नहीं उठा सके, हमें अपनी जीत पर ही शर्मिंदगी हो रही थी, हम समझौता करने के लिए पाकिस्तान की तरफ झुके जा रहे थे।

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इनके अलावा भारत के राजनीति विज्ञान के प्रोफ़सर उदय बालाकृष्णन ने 20 नवंबर, 2019 को यानी इंदिरा गांधी के जन्मदिन के अवसर पर एक दैनिक समाचार पत्र में एक लेख लिखा था, जिसमें उन्होंने बताया था कि, हम कभी भी यह नहीं जान पाएंगे कि, ऐसी कौन सी परिस्थितियां थीं, जिसने 1971 के युद्ध के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पाकिस्तान के साथ एक नुक़सानदायक सौदा करने पर मजबूर कर दिया था। शिमला समझौते और उसके बाद के दिल्ली समझौते ने पाकिस्तान को वह सब कुछ दे दिया गया जो वह चाहता था।

भुट्टो के झूठ में फंसी इंदिरा गांधी

बातचीत की टेबल पर मौजूद  भारतीय प्रतिनिधिमंडल, जिसमें डी.पी. धर और पी.एन. हक्सर शामिल थे, भुट्टो की चालों में फंस गए और खुद इंदिरा गांधी ने भी भुट्टों झूठ  को नहीं समझ सकीं। भुट्टो ने कश्मीर पर कोई ठोस वादा नहीं किया और शिमला समझौते के कागजात पर दस्तखत तो कर दिए गये। इधर, समझौते के बाद पाकिस्तान की तरफ से (भुट्टों  की तरफ से) लगातार भारत विरोधी बयानबाजी होती रही।

आज तक नहीं हो सकी 54 भारतीय युद्धबंदियों की रिहाई

भारत ने अपने हितों को न सोचते हुए बांग्लादेश की मांगों को प्राथमिकता दी। वहीं, पाकिस्तान इस बात बराबर अड़ा हुआ था कि उसके 195 पाकिस्तानी सैनिकों पर बांग्लादेश में मुकदमा न चले। बांग्लादेश की स्वतंत्रता के लिए भारत ने पाकिस्तान की ये मांग मान ली। बांग्लादेश पर ही फोकस रखने का नतीजा ये रहा कि, भारत अपने 54 युद्धबंदियों की रिहाई की बात भी टेबल पर ठीक ढंग से नहीं उठा सका।

बातचीत की टेबल से दूर रखी गई सेना

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ये भी माना जाता है कि शिमला समझौते में भारत के कमजोर पड़ने के मुख्य कारण टेबल पर सैन्य विशेषज्ञों की अनुपस्थिति भी थी। बताया जाता है कि युद्ध जीतने वाली भारतीय सेना को वार्ता से बाहर रखा गया था। यही वजह थी रणनीतिक समझौता कमजोर पड़ गया।

एलओसी (नियन्त्रण रेखा) को इंटरनेशनल सीमा बनाने को लेकर किसी भी तरह का लिखित समझौता नहीं हुआ, नतीजतन बाद में पाकिस्तान  अपनी बात से मुकर गया। यही वजह थी कि 1971 के बाद भारत को सियाचिन (1984) कारगिल (1999) संघर्ष का सामना करना पड़ा।  हालांकि दोनों ही युद्धों में भारत को जीत मिली, लेकिन इंदिरा गांधी अगर जुल्फिकार अली भुट्टो की बातों में न आतीं, तो शायद भारत को इन युद्धों से बचाया जा सकता था।

ये भी कहा जाता है कि, युद्ध के दौरान और बाद में भारत पर अमेरिका का इतना दबाव था कि इंदिरा गांधी ज्यादा कठोरता नहीं दिखा सकीं। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और किसिंजर का पूरा समर्थन पाकिस्तान को था। अमेरिका ने शिमला समझौता से पहले भारत को चेतावनी दी कि वह आगे से पाकिस्तान पर आक्रमण न करें। इधर, सोवियत संघ ने भारत का साथ तो दिया, लेकिन युद्ध को लंबा खींचने से रोका, क्योंकि वह भी अमेरिका से टकराव नहीं चाहता था।

उस वक्त भारत को आजादी मिली महज ढाई दशक ही हुए थे, ऐसे में वह आर्थिक रूप से काफी कमजोर था, उस पर बंगलादेशी शरणार्थियों की भी जिम्मेदारी थी और हथियारों के लिए दूसरे देशों पर ही निर्भर था। अमेरिका ने भी भारत को आर्थिक मदद देने से इंकार कर दिया था। वहीं, पीओके के लोगों का समर्थन भी उसके पास नहीं था। ऐसे में भारत के पास लंबे समय तक युद्ध लड़ने की क्षमता नहीं थी।

शिमला समझौते का फायदा

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हालांकि, शिमला समझौते से भारत को कुछ फायदा भी मिला है। जैसे कि समझौते में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि, भारत और पाकिस्तान अपने सभी विवाद (खासकर जम्मू-कश्मीर) को द्विपक्षीय वार्ता से यानी बिना किसी तीसरे की मध्यस्थता से सुलझाएंगे। दरअसल, पाकिस्तान कश्मीर को आए दिन अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाने का प्रयास करता रहता था (संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों के आधार पर) लेकिन अब भारत हर बार शिमला समझौते का हवाला देकर तीसरे पक्ष (जैसे अमेरिका या यूएन) को इस मुद्दे पर हस्तक्षेप करने से रोक देता है। यह प्रावधान आज भी भारत की विदेश नीति का मजबूत आधार है और कश्मीर मुद्दे पर भी मजबूती देता है।

 

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