
नई दिल्ली। Cold War: ब्रिक्स (ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) एक ऐसा संगठन है जो उभरती अर्थव्यवस्थाओं को एक मंच प्रदान करता है। इस समूह में अब 10 देश (मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात सहित) शामिल हो चुके हैं और वैश्विक अर्थव्यवस्था में इसकी 41 फीसदी की हिस्सेदारी है। दूसरी तरफ पश्चिमी देशों का नेतृत्व अमेरिका और नाटो (उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन) कर रहे हैं, जो मुख्य रूप से सैन्य और आर्थिक शक्ति का केंद्र है। हाल ही में, नाटो महासचिव मार्क रूट ने भारत, चीन और ब्राज़ील को रूस के साथ व्यापार बंद करने की चेतावनी दी और 100% टैरिफ और द्वितीयक प्रतिबंधों की धमकी दी। आशंका है कि, ये धमकी ब्रिक्स और पश्चिमी देशों के बीच एक नये शीत युद्ध की शुरुआत हो सकती है।
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क्या है शीत युद्ध

शीत युद्ध एक ऐसा युद्ध है जो दो देशों या समूहों के बीच बिना सीधे युद्ध के तनाव, प्रतिस्पर्धा और आर्थिक-सैन्य दबाव की तरह होता है। हालांकि, इसमें हथियारों का इस्तेमाल नहीं होता है। अमेरिका और सोवियत रूस के बीच 1945 से लेकर 1991 तक शीत युद्ध चला था। इस दौरान दोनों देशों ने हथियारों की होड़, जासूसी और आर्थिक प्रतिबंधों के जरिए एक-दूसरे को कमजोर करने का जमकर प्रयास किया था। मौजूदा दौर में भी BRICS और पश्चिमी देशों के बीच बढ़ता तनाव कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है। हालांकि ये आर्थिक और भू-राजनीतिक (जियोपॉलिटिकल) मुद्दों पर केंद्रित है।
BRICS एक ऐसा समूह है जिसका मकसद वैश्विक दक्षिण के देशों को एक मजबूत मंच देना और पश्चिमी वर्चस्व (जैसे अमेरिकी डॉलर और पश्चिमी संस्थानों) को चुनौती देना। ब्राजील के रियो डी जनेरो में बीती 6-7 जुलाई को हुए 17वें BRICS समिट में कई अहम फैसले लिए गए।
ये फैसले लिए गए
अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करना
BRICS देश अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए लंबे समय से स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और एक नई BRICS मुद्रा बनाने पर जोर दे रहे थे। इससे अमेरिकी डॉलर को वैश्विक स्तर पर चुनौती मिल सकती है।
पश्चिमी नीतियों की आलोचना
17 वें BRICS समिट में अमेरिका के टैरिफ और इजरायल-ईरान युद्ध की निंदा की गई, जिससे अमेरिका और NATO नाराज ब्रिक्स में शामिल देशों ने नाराज दिखे।
वैश्विक दक्षिण की आवाज
BRICS ने संयुक्त राष्ट्र और विश्व बैंक जैसे संस्थानों में भारत और ब्राजील की बड़ी भूमिका की मांग की।
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ब्रिक्स के इन फैसलों से पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका को लगता है कि, BRICS उनकी आर्थिक और राजनीतिक शक्ति को कमजोर करने की कोशिश कर रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने BRICS को अमेरिका विरोधी बताते हुए 10 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ और 100 प्रतिशत सेकेंडरी टैरिफ लगाने की धमकी दी है।
NATO की धमकी

मंगलवार 15 जुलाई को NATO के महासचिव मार्क रूट ने चीन, भारत और ब्राजील को धमकी दी कि, यदि वे रूस के साथ व्यापार जारी रखेंगे, तो उन पर भारी आर्थिक प्रतिबंधों लगाया जायेगा। रूट ने कहा, बीजिंग, दिल्ली और ब्राजील के पीएम या राष्ट्रपति इस बात पर ध्यान दें, क्योंकि यह आपको बहुत नुकसान पहुंचा सकता है। उन्होंने कहा भारत, चीन और ब्राजील ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को फोन करके यूक्रेन के साथ शांति समझौता करने के लिए दबाव डालने को कहा।
भारत-रूस के साथ संबंध
भारत और रूस पुराने मित्र हैं। दोनों देशों एक-दूसरे के साथ हमेशा खड़े रहे हैं। दोनों देशों के बीच मजबूत रक्षा डील है और भारत रूस से सस्ते दाम में तेल भी खरीदता है। जो उसकी अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी है।
NATO की धमकी का असर
अगर अमेरिका भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाता है, तो उसे निर्यात (जैसे दवाइयां, कपड़े) में नुकसान उठाना पड़ेगा। हालांकि, भारत ने साफ कर दिया है कि, वह किसी के दबाव में नहीं आएगा और अपनी नीतियों को स्वतंत्र रखेगा।
भारत की रणनीति
भारत BRICS का काफी एक्टिव सदस्य है। साथ ही भारत, अमेरिका और QUAD (अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया) के साथ भी रिश्ते बनाए रखना चाहता है। भारत और चीन के बीच तनाव से भी BRICS की एकजुटता को कमजोर होती है।
चीन-रूस का समर्थन
चीन और रूस दोनों एक दूसरे के बड़े साझेदार हैं। यूक्रेन युद्ध में चीन का रूस को अप्रत्यक्ष समर्थन प्राप्त है।
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धमकी का असर

अगर अमेरिका टैरिफ में बढ़ोत्तरी करता है, तो चीन की अर्थव्यवस्था को तगड़ा झटका लग सकता है क्योंकि ड्रैगन भारी मात्रा में अमेरिका में सामान निर्यात करता है, लेकिन चीन BRICS को पश्चिमी वर्चस्व के खिलाफ एक हथियार के तौर पर देखता है।
चीन की स्थिति
चीन ने NATO की धमकी को खारिज करते हुए साफ़ कर कहा है कि, वह यूक्रेन युद्ध में रूस को किसी भी तरह का हथियार नहीं दे रहा और उसका सैन्य विकास सामान्य है।
ब्राजील का स्वतंत्र रुख
अमेरिकी धमकी के बाद ब्राजील के राष्ट्रपति लूला ने BRICS को गुट-निरपेक्ष आंदोलन की तरह पेश किया। उनका कहना है कि, ब्रिक्स न तो पश्चिमी देशों के साथ है और न ही उनके खिलाफ।
धमकी का असर
बता दें कि, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ब्राजील को पहले से ही 50% टैरिफ की धमकी दे चुके हैं, क्योंकि उसने पूर्व राष्ट्रपति बोल्सोनारो के खिलाफ मुकदमा चलाया है। बताया जा रहा है कि NATO की धमकी से ब्राजील का तेल और कृषि निर्यात प्रभावित हो सकता है।
ब्राजील की रणनीति
ब्राजील BRICS को वैश्विक दक्षिण की आवाज बनने की तो इच्छा रखता है, लेकिन वह अमेरिका के साथ टकराव भी नहीं चाहता है।
क्या यह नया शीत युद्ध है?
BRICS और पश्चिमी देशों के बीच बने तनाव पूर्ण माहौल को शीत युद्ध कहना जल्दबाजी हो सकती है, लेकिन कुछ संकेत ऐसे हैं और शीत युद्ध जैसे माहौल को दर्शाते हैं।
आर्थिक युद्ध
अमेरिका और NATO द्वारा टैरिफ और प्रतिबंध लगाने की धमकी देना BRICS देशों को आर्थिक नुकसान पहुंचाने की कोशिश है। यह पुराने शीत युद्ध (अमेरिका-सोवियत रूस शीत युद्ध) की तरह नहीं, बल्कि अब ये आर्थिक और तकनीकी प्रतिस्पर्धा का रूप ले रहा है।
वैचारिक टकराव
BRICS इस समय वैश्विक दक्षिण की आवाज बनकर पश्चिमी वर्चस्व को चुनौती देने में लगा है। वहीं NATO और अमेरिका समेत अन्य पश्चिमी देश अपनी सैन्य और आर्थिक शक्ति को बनाए रखना चाहते हैं।
BRICS की कमियां
BRICS में कुछ ऐसे देश भी शामिल हैं, जिनके बीच एकजुटता की कमी है (जैसे भारत-चीन तनाव) वहीं, कुछ देश पश्चिम देशों के साथ भी मजबूत जुड़ाव रखते हैं (जैसे भारत और ब्राजील)। यही वजह है कि, ब्रिक्स को पूरी तरह से पश्चिमी देशों की खिलाफत करने में मुश्किल का सामना करना पड़ता है। हालांकि, ब्रिक्स और पश्चिमी देशों के बीच ये टकराव अभी सैन्य युद्ध की बजाय आर्थिक और कूटनीतिक स्तर पर है। अगर आने वाले समय में BRICS अपनी मुद्रा या वैकल्पिक वित्तीय व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में ठोस कदम उठाता है, तो तनाव और ज्यादा बढ़ सकता है।
भारत की स्थिति और भविष्य
बता दें कि, भारत BRICS में एक प्रमुख भूमिका निभाता है और काफी सक्रिय रहता है। 2026 में BRICS समिट की मेजबानी का जिम्मा भारत को मिला है। भारत की नीति संतुलन की है। वह न तो खुलकर पश्चिमी देशों की खिलाफत करता है और न ही पूरी तरह से उनके साथ है। भारत रूस से सस्ता तेल और हथियार खरीदता है, जो अमेरिका को पसंद नहीं है। बावजूद इसके भारत अमेरिका और NATO के साथ भी रिश्ते बनाए रखता है। हालांकि, NATO की धमकी भारत के लिए एक चुनौती है, लेकिन भारत अपनी स्वतंत्र नीति पर अधिक भरोसा करता है।
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