
नई दिल्ली। Rape Case: राजस्थान के अजमेर जिले में 33 साल पहले 11 साल की बच्ची के साथ हुए दुष्कर्म के आरोपी की सजा को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा, लेकिन दिलचस्प बात ये है कि, कोर्ट ने 53 साल के इस शख्स को नाबालिग वाली सजा देने का फैसला किया है। इस फैसले के तहत आरोपी को अधिक से अधिक तीन साल के लिए विशेष गृह भेजा जा सकता है। कोर्ट ने शख्स को किशोर न्याय बोर्ड (जेजेबी) के सामने पेश होने का निर्देश दिया।
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376 के तहत दर्ज हुआ था मामला

उल्लेखनीय है कि, आज से करीब 32 साल पहले यानी 1993 में किशनगढ़ के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने इस शख्स को धारा 376 के तहत दुष्कर्म का दोषी करार दिया था और पांच साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। इस फैसले के खिलाफ आरोपी ने राजस्थान के हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। हाईकोर्ट ने भी निचली अदालत के आदेश को जुलाई 2024 में बरकरार रखने का फैसला दिया। यहां दोषी ने घटना के वक्त खुद के नाबालिग होने का मुद्दा नहीं उठाया था।
सुप्रीम कोर्ट में डाली याचिका
हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ वह सुप्रीम कोर्ट गया, जहां पहली बार उसने उस वक्त खुद के नाबालिग होने का जिक्र किया। सुप्रीम कोर्ट के जांच आदेश के बाद सत्र न्यायाधीश इस नतीजे पर पहुंचे कि अपराध करते समय वह नाबालिग था। दोषसिद्ध और सजा के खिलाफ दायर की गई याचिका को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने अजमेर के किशनगढ़ स्थित जिला एवं सत्र न्यायाधीश को उसके इस दावे ‘जिसमें उसने खुद को अपराध के वक्त किशोर बताया था’ की जांच करने का निर्देश दिया था कि क्या अपराध के दिन आरोपी किशोर था।
अपराध के समय नाबालिग था शख्स
जांच और दस्तावेज़ी साक्ष्यों की समीक्षा करने के बाद न्यायाधीश ने फैसला किया कि अपराध के समय वह शख्स किशोर था, जिस वक्त अपराध हुआ था (17 नवंबर, 1988) को उसकी आयु 16 वर्ष, 2 माह और 3 दिन थी। जांच रिपोर्ट के आधार पर न्यायमूर्ति बी.आर. गवई और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने आरोपी को राजस्थान हाईकोर्ट की सज़ा रद्द कर दी और कहा, नाबालिग होने का दावा किसी भी स्तर पर किया जा सकता है। इसके साथ ही, राज्य सरकार के तर्क को भी खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, उपरोक्त साक्ष्यों को देखते हुए आरोपी पर किशोर न्याय (बालकों की देखभाल एवं संरक्षण) अधिनियम, 2000 में निहित प्रावधान लागू होंगे।
कोर्ट ने कहा,ऐसी स्थिति में निचली अदालत द्वारा दी गई और राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा बरकरार रखी गई सजा को रद्द करना होगा क्योंकि यह टिक नहीं सकती। अधिनियम, 2000 की धारा 15 और 16 के आलोक में उचित आदेश पारित करने के लिए मामला बोर्ड को भेजा जाता है। पीठ ने कहा, अपीलकर्ता को 15 सितंबर को बोर्ड के समक्ष उपस्थित होने का निर्देश दिया जाता है।
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