
Godi Media: गोदी मीडिया, मीडिया जगत का वह विवादित शब्द है, जिसकी चर्चा आज भी बराबर होती है। यह शब्द आज भी लोगों की जिज्ञासा उतनी ही बढ़ाता है, जितनी एक दशक पहले बढ़ाता था, जब इसका जन्म हुआ था। इस लेख में हम इस शब्द की उत्पत्ति पर विस्तार से चर्चा करेंगे। साथ ही यह भी बताएंगे कि, यह शब्द सबसे पहले किसने और क्यों इस्तेमाल किया? और आज यह इतना आम क्यों हो गया है?
एक दशक पहले चर्चा में आये ‘ गोदी मीडिया’ शब्द को सुनते ही अधिकतर लोगों के दिमाग में कुछ टीवी चैनल्स, डिजिटल प्लेटफार्म और अख़बार की छवि उभरने लगती है। आरोप लगते हैं कि, ये मीडिया प्लेटफार्म सत्ता पक्ष के अंधे पैरोकार हैं। विपक्ष, आलोचक और कुछ सोशल मीडिया यूजर्स का मानना है कि, ये मीडिया संस्थान सरकार की जमकर चाटुकारिता करते करते हैं, उसकी कमियों और गलतियों पर लीपापोती करते हैं
क्या है गोदी मीडिया का अर्थ?
हिंदी में गोदी का मतलब होता है गोद में बैठना, जैसे बच्चा अपनी मां की गोद में बैठता है। यहां गोदी मीडिया का मतलब उन संस्थानों और पत्रकारों से है, जो सत्ता या सरकार की जी हुजूरी करते हैं। आलोचक कहते हैं कि ये संस्थान और पत्रकार सत्ता व सरकार की गोद में बैठे हैं। कहने का मतलब है कि, जो भी संस्थान या पत्रकार निष्पक्ष पत्रकारिता करने की बजाय सरकार और प्रधानमंत्री की उपलब्धियों को बढ़ाचढ़ा कर जनता के सामने पेश करते हैं और विपक्ष द्वारा उठाये जा रहे मुद्दों को दरकिनार करते हैं या फिर कम महत्व देते हैं। उन्हें गोदी मीडिया कहते हैं।
अगर इसे और सरल भाषा में समझना है, तो ऐसे मीडिया संस्थान जो आलोचकों की नजर में “लैपडॉग” यानी पालतू कुत्ता की भूमिका निभा रहे होते हैं वे गोदी मीडिया हैं। इस शब्द का इस्तेमाल कई एक्टिविस्ट, स्वतंत्र पत्रकार (जो निष्पक्ष खबरें दिखाने पर भरोसा करते हैं) विपक्ष और जागरूक लोग करते हैं।
गोदी मीडिया शब्द का जन्म

अब बात करते हैं कि, ये शब्द आया कहां से और सबसे पहले इसका इस्तेमाल कब, किसने, क्यों और किस सन्दर्भ में किया था? तो आपको बता दें कि, ये शब्द पहली बार साल 2014-15 में तब चर्चा में आया, जब देश में बीजेपी की नरेंद्र मोदी सरकार बनी। उस समय कुछ स्वतंत्र और निष्पक्ष सोच रखने वाले पत्रकारों और आलोचकों को लगा कि कुछ मीडिया संस्थान, पत्रकार और डिजिटल प्लेटफार्म केंद्र की मोदी सरकार के प्रति काफी नरम रवैया अपना रहे हैं और सरकार की छोटी से छोटी उपलब्धि को बढ़ाचढ़ा कर जनता के बीच ले जा रहे हैं।
एक पत्रकार ने बनाया ‘गोदी मीडिया’ को लोकप्रिय
गोदी मीडिया शब्द को एक बड़े चैनल के सीनियर पत्रकार ने काफी लोकप्रिय बना दिया। वे अपने लेखों और शो में इस शब्द का इस्तेमाल उन संस्थानों पर कटाक्ष करने के लिए करने लगे, जो संस्थान सरकार की तरफ ज्यादा झुकाव रखते थे। धीरे-धीरे ये शब्द सोशल मीडिया, ट्विटर (x) पर तेजी से वायरल होने लगा। ये शब्द अब राजनीतिक बहसों, चुनाव प्रचारों में आम हो गया है।
आम आदमी पार्टी, कांग्रेस, वाम दल और तमाम क्षेत्रीय पार्टियां इस शब्द का खूब इस्तेमाल करती है। आलम ये है कि, ये शब्द राजनीति का अहम हिस्सा बन गया है। कोई बहस हो, आन्दोलन हो, इंटरव्यू हो, अर्थव्यवस्था हो या कोई डिबेट हो, विपक्ष के अधिकतर जवाब में गोदी मीडिया शब्द का इस्तेमाल होता है। विपक्ष सीधा आरोप लगाता है कि, गोदी मीडिया हकीकत छिपा रहा है।
लगते हैं ये बड़े आरोप
विपक्ष और कुछ आलोचकों का आरोप है कि, गोदी मीडिया संस्थान सरकार (भाजपा सरकार) की नीतियों और उपलब्धियों का तो खूब बखान करता है, लेकिन उसकी कमियों और विफलताओं को छिपाता है। गोदी मीडिया वाले संस्थाओं में होने वाले प्राइम टाइम डिबेट में सत्ता पक्ष के पैनलिस्ट्स को ज्यादा जगह दी जाती है और उनकी बातों को भी प्रमुखता से सुना जाता है, लेकिन अन्य पक्षों के पैनालिस्ट को न तो उचित जगह मिलती है और न ही उनके विचारों को सुना जाता है।

डिबेट्स में देश के बड़े संवेदनशील मुद्दों जैसे महंगाई, बेरोजगारी, संस्थाओं की स्वतन्त्रता, निजीकरण, किसान आदोलन, छात्र आन्दोलन, यूजीसी, एसआईआर समेत तमाम मुद्दों पर चर्चा तक नहीं की जाती है, और अगर किसी पैनालिस्ट ने इस पर सवाल उठाने का प्रयास किया, तो उसे ये कह कर रोक दिया जाता है कि, ये डिबेट का विषय नहीं है या फिर उसके सवाल को टाल दिया जाता है।
पत्रकारिता का पतन
आलोचकों और विपक्ष का आरोप है कि, चैनल और डिजिटल मीडिया प्लेटफार्म ही नहीं बल्कि कुछ अख़बार भी अपने संपादकीय पेज पर सरकार की जमकर चाटुकारिता करते हैं। आरोप ये भी लगते हैं कि, गोदी मीडिया संस्थानों के मालिकों के हित सरकार से जुड़े हैं। सरकार की चाटुकारिता करने का उन्हें फायदा मिलता है जैसे कि विज्ञापन, लाइसेंस आदि में। आलोचक कहते हैं कि, ये एक तरह से पत्रकारिता का पतन है। जब पत्रकार सवाल न पूछे, संस्थान किसी एक पक्ष या यूं कहें कि, सत्ता पक्ष की कवरेज और वाहवाही में ही जुटा रहे तो ये समझ लो पत्रकारिता सबसे बुरे दौर से गुजर् रही है।
देश की आजादी में पत्रकारिता रीढ़ की हड्डी थी
एक वह दौर था जब पत्रकारिता और सत्ता के बीच टकराव होता था, बड़े-बड़े मुद्दों पर सवाल उठाये जाते थे, सरकार और सत्ता में बैठे लोग पत्रकार के सवालों के जवाब देने को मजबूर होते थे, लेकिन आज न तो पत्रकार सवाल पूछता है और न ही जरूरी मुद्दे उठाता है। देश की आजादी में भी पत्रकारिता का बड़ा योगदान था। ऐसा भी कह सकते हैं कि, पत्रकारिता की भूमिका रीढ़ की हड्डी के समान थी। क्रांतिकारियों और बुद्धिजीवियों के लिखे लेखों ने लोगों में चेतना जगाई। नतीजा ये रहा कि, गांव-गांव, गली-गली, शहर-शहर हर जगह लोग अंग्रेजों के खिलाफ खड़े हो लगे।
उदन्त मार्तण्ड (1826) ,यंग इंडिया और हरिजन, केसरी और मराठा, प्रताप (1913), अमृता बाजार पत्रिका जैसे तमाम समाचार पत्रों ने लोगों में ऐसा जोश भरा की पूरा देश अंगेजों के खिलाफ खड़ा हो गया और एक समय ऐसा भी आया जब अंग्रेज देश छोड़कर जाने को मजबूर हो गये, लेकिन अब ऐसा नहीं है अब बहुत से पत्रकार और संस्थान सत्ता के साथ ही खड़े नजर आते हैं।
विपक्ष की खिलाफत करने में गोदी मीडिया सबसे आगे
2014 के बाद की पत्रकारिता का काम नैरेटिव फैलाना रह गया है। मुद्दा कोई भी हो अगर विपक्ष ने उसकी खिलाफत कर दी, तो उसे राष्ट्र विरोधी साबित करने में गोदी मीडिया सबसे आगे रहती है। गोदी मीडिया पत्रकरिता पर आरोप लगते हैं कि, वह किसी भी नीति, कानून या सरकारी फैसले का विरोध करने वाली पार्टी, जनता, छात्र, किसान या विपक्षी नेता को देश विरोधी, अराजकतावादी या विदेशी ताकतों द्वारा संचालित घोषित करने में तनिक भी देरी नहीं करती। ऐसा करने से जनता के बीच सीधा संदेश जाता है कि, सरकार सही है, विरोध करने वाले गलत है और वे देश को अस्थिर करने की कोशिश कर रहे हैं।
दूसरा आरोप लगता है कि, प्राइम-टाइम डिबेट्स में हिंदू-मुस्लिम संबंध, पाकिस्तान, और धार्मिक विवादों जैसे भावनात्मक और संवेदनशील मुद्दों को लगातार उछाला जाता है। ऐसा करके लोगों के बीच नफरत फैलाई जाती है और जाति धर्म के नाम पर लोगों को बांटने का काम किया जाता है।
डिस्क्लेमर – यह लेख एक विश्लेषण है। इसमें व्यक्त विचार लेखक के हैं।”








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