
नेपाल। Make Nepal Hindu Nation Again: नेपाल को फिर से हिन्दू राष्ट्र बनाने की मांग तेज ही गई है। यहां राजशाही के पक्ष में उस वक्त जनज्वार सड़कों पर उमड़ पड़ा, जब यहां के पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह पोखरा से काठमांडू लौटे। उनके स्वागत के लिए हजारों क संख्या में लोग एयरपोर्ट पहुंच गये और उन्हें नेपाल की राजनीति में शामिल होने के नारे लगाने लगे। नेपाल में इस बात की भी चर्चा ने जोर पकड़ लिया है कि 77 वर्षीय ज्ञानेंद्र शाह फिर से राजनीति में वापसी कर सकते हैं। इधर, इस प्रदर्शन को लेकर नेपाल के प्रधानमंत्री और सत्ताधारी पार्टी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी, CPN-UML) के नेता केपी शर्मा ओली का कहना है कि इसके पीछे ‘बाहरी शक्तियां’ काम कर रही हैं। हालांकि, पोखरा से काठमांडू लौटे पूर्व राजा ज्ञानेंद्र को मिल रहे जनता के समर्थन से नेपाल का सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही सहम गये हैं।
पीएम ने ‘बाहरी शक्तियों’ को ठहराया जिम्मेदार

नेपाल के अंग्रेजी समाचारपत्र ‘द काठमांडू पोस्ट’ की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि, प्रधानमंत्री ओली ने इस प्रदर्शन के लिए ‘बाहरी शक्तियों’ को जिम्मेदार ठहराया है। दरअसल, प्रदर्शन में भारत के राज्य उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तस्वीर दिखाई जा रही थी, जिसे लेकर ओली ने कहा, हमारे हालात अभी ऐसे नहीं हुए हैं कि एक रैली आयोजित करने के लिए हमें विदेशी नेताओं की तस्वीर के सहारे को जरूरत पड़े।उन्होंने इन प्रदर्शन को ‘अलोकतांत्रिक’ और व्यवस्था ‘विरोधी’ बताया है। नेपाल के पीएम ने कहा, “हमारे पास अलोकतांत्रिक, व्यवस्था-विरोधी और असंवैधानिक गतिविधियों के लिए समय नहीं है।’
सतर्क हुईं कम्युनिस्ट पार्टियां
बता दें कि, नेपाल में इस समय नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी, CPN-UML) की सरकार है। इस पार्टी के नेता के.पी. शर्मा ओली नेपाल के प्रधानमंत्री हैं। इस पार्टी को नेपाली कांग्रेस का भी समर्थन प्राप्त है। पूर्व राजा ज्ञानेंद्र के साथ जनता के इस भावात्मक जुड़ाव को देखकर सत्ता पक्ष के साथ ही विपक्ष में मौजूद कम्युनिस्ट पार्टियां भी सतर्क हो गई हैं। हालांकि, वे ज्ञानेंद्र शाह की राजनीति में वापसी से इनकार कर रही हैं।
राजशाही में समर्थन में उमड़ा सैलाब

राजशाही के समर्थन में उमड़े इस जन सैलाब को देखकर नेपाल की मुख्य विपक्षी पार्टी सीपीएन (माओवादी सेंटर) जो कि तराई-मधेश जिलों में महीने भर से चल रहे ‘जागृति अभियान’ चला रही थी, को रोक दिया है और पार्टी के अध्यक्ष पुष्प कमल दहल समेत अन्य शीर्ष नेता काठमांडू लौट आए हैं। उनका कहना है कि, मौजूदा हालात को देखते हुए पार्टी को जिलों से ज्यादा केंद्र यानी की काठमांडू की राजनीति में सक्रिय होने की जरूरत है। राजशाही के पक्ष उमड़ी भीड़ को देखते हुए सीपीएन (माओवादी सेंटर) की बैठक हुई, जिसमें शीर्ष नेताओं ने कहा कि, देश में राजशाही की वापसी की कोई संभावना नहीं है, लेकिन पूर्व राजा के स्वागत में उमड़ा जन सैलाब वर्तमान सरकार की विफलता को दर्शा रहा है। जनता वर्तमान सरकार से निराश है, जिससे वह राजशाही की तरफ उम्मीद भरी नजरों से देख रही है।
कम्युनिस्ट पार्टियों के लिए खतरे की घंटी
बता दें कि, पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह के समर्थन में उमड़ी भीड़ ने ‘राजमहल खाली करो, राजा आओ, देश बचाओ और हिन्दू राष्ट्र की वापसी की मांग के नारे भी लगाये थे। दरअसल, नेपाल की राष्ट्रीय प्रजातांत्रिक पार्टी ज्ञानेंद्र शाह की राजनीति में वापसी का समर्थन कर रही है। नेपाल की राजनीति के जानकारों का कहना है कि, हिन्दू राष्ट्र की मांग और राजशाही की वापसी सुगबुगाहट से नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टियां खतरे में आ सकती हैं क्योंकि सीपीएन (माओवादी सेंटर), CPN-UML जैसी पार्टियां इन्हीं दोनों चीजों का विरोधकर सत्ता में आई हैं। ऐसे में अब इस विचारधारा की वापसी की मांग उनकी राजनीतिक विचारधारा, शासन प्रणाली और जनसमर्थन को प्रभावित कर सकती है।
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6 अप्रैल को होगी सामूहिक रैली

इस बारे में बात करते हुए सीपीएन (माओवादी सेंटर) के उपाध्यक्ष और पार्टी प्रवक्ता अग्नि प्रसाद सपकोटा का कहना है कि, ” बीते कुछ दिनों से प्रतिगामी ताकतें एक्टिव हो गई हैं। इसकी मुख्य वजह वर्तमान सरकार की विफलता है। खराब शासन और अव्यवस्था से लोगों में निराशा है।’ माओवादी सेंटर का मानना है कि पूर्व राजा की बढ़ती सक्रियता के खिलाफ एक मजबूत प्रतिरोध की जरूरत पड़ेगी। द काठमांडू पोस्ट की एक रिपोर्ट में सपकोटा के हवाले से कहा गया है कि, पार्टी सोशलिस्ट फ्रंट के शीर्ष नेताओं के साथ एक बड़े विरोध प्रदर्शन पर विचार कर रही है, इससे पहले, 6 अप्रैल को फ्रंट ने एक सामूहिक रैली आयोजित करने का निर्णय लिया था।
प्रचंड की पार्टी करेगी बड़ी रैली
बता दें कि, ये वही तारीख है जब 1990 में नेपाल में बहुदलीय लोकतंत्र को बहाल करने वाले पहले जन आंदोलन के दौरान बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ था, लेकिन हालात बदल गये हैं जिसे देखते हुए प्रचंड की पार्टी ने एक बड़ी रैली करने का फैसला किया है। पार्टी इस रैली के जरिये राजशाही समर्थकों को जवाब देने के मूड में है। इस सिलसिले में सोमवार को पुष्प कमल दहल ने एक दूसरे कम्युनिस्ट नेता CPN-Unified Socialist के चीफ माधव कुमार से मुलाकात की और इस पर चर्चा की।
सरकार के कमकाज से निराश है जनता

हालांकि, इस मीटिंग के बाद प्रचंड ने ये दावा किया कि वे राजशाही समर्थक ताकतों की गतिविधियों से बिल्कुल भी चिंतित नहीं हैं क्योंकि लोग मौजूदा सरकार के कामकाज से नाराज़ और निराश हैं, यही वजह है कि वे राजशाही के समर्थन में सड़क पर उतरे हैं। दहल ने कहा कि, सरकार को इसकी ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए।” उधर CPN-Unified Socialist के अध्यक्ष माधव कुमार नेपाल ने इसके लिए प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली सरकार की अक्षमता और खराब शासन को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा, देश में विदेशी ताकतों के उभार के लिए वर्तमान सरकार जिम्मेदार है। देश की व्यवस्था की रक्षा करना गणतंत्रवादी राजनीतिक ताकतों की प्राथमिक जिम्मेदारी है, जिसमें मौजूदा सरकार पूरी तरह से विफल रही है।
कार्यशैली सुधारे राजनीतिक दल
वहीं, राजनीतिक विश्लेषक का कहना है कि, सरकार और राजनीतिक दलों को इस प्रदर्शन को गंभीरता से लेना चाहिए, यह प्रदर्शन राजनीतिक दलों, उनके नेतृत्व वाली सरकारों और उनके नेतृत्व की सामूहिक विफलता का परिणाम है। सत्ता पक्ष और विपक्ष को इस प्रदर्शन को लेकर एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप करने की बजाय आत्मनिरीक्षण करना चाहिए और अपने-अपने संगठनों की कार्यशैली में सुधार करना चाहिए।
2008 तक था हिन्दू राष्ट्र

उल्लेखनीय है कि, नेपाल दुनिया का एकमात्र हिन्दू राष्ट्र था, लेकिन साल 2008 में इसे लोकतांत्रिक देश बना दिया गया। यहां ‘माओवादी ‘क्रांति’ के बाद लोकतांत्रिक सरकार बहाल हुई और राजशाही का अंत हुआ। अब 16 साल बाद नेपाल में एक बार फिर से राजशाही और हिन्दू राष्ट्र की मांग को लेकर आन्दोलन तेज हो गया है।
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