
नई दिल्ली। Coup In Pakistan: पाकिस्तान में एक बार फिर से सैन्य तख्तापलट की आशंका बढ़ गई है। ऐसा लग रहा है कि, अब जल्द ही यहां के पीएम शाहबाज शरीफ की कुर्सी जाने वाली है। दरअसल, जिस तरह से भारत के ‘ऑपरेशन सिन्दूर’ जिसमें आतंकियों के ठिकाने तबाह किए गए थे, में बिना वजह पाकिस्तानी सेना कूद गई थी और उसे हार का सामना करना पड़ा था, जिससे पूरी दुनिया में उसकी किरकिरी हुई थी। बावजूद इसके वहां की शाहबाज सरकार को जनरल असीम मुनीर को पदोन्नति देनी पड़ी, उससे साफ़ संकेत मिल रहे हैं कि, पाकिस्तान की सरकार वहां की सेना की मुट्ठी में आ गई है।
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नवाज को भी करना पड़ा था तख्तापलट का सामना

बता दें कि, भारत-पाकिस्तान संघर्ष के बाद खुद पाकिस्तानी सेना ने स्वीकार किया है कि, उसने भारत के साथ जबरन लड़ाई छेड़ी थी और इस लड़ाई में उसकी ही हार हुई है। पाकिस्तान के ही सत्ताधारी नेताओं ने भी यह साबित कर दिया है कि, भारतीय सेना ने जवाबी कार्रवाई में पाकिस्तान में किस कदर कहर बरपाया है। पाकिस्तानी सेना की करारी हार के बावजूद वहां के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ की सरकार को सेना के जनरल मुनीर को फील्ड मार्शल के पद पर पदोन्नत कर सम्मानित करना पड़ा, उससे तो यही लग रहा है कि, पाकिस्तान की सरकार अब पूरी तरह से पाकिस्तानी सेना के नियंत्रण में हैं। आज से करीब ढाई दशक पहले भी पाकिस्तान में कुछ ऐसी ही परिस्थितियां बनी थीं, जब शाहबाज के भाई और पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को सैन्य तख्तापलट का सामना करना पड़ा था।
हार को छिपाने की कोशिश

एक्सपर्ट्स का मानना है कि, जनरल असीम मुनीर की पदोन्नति के पीछे पाकिस्तानी सेना द्वारा ‘अपनी हार छिपाने’ की एक कोशिश है। ऐसा करके पाकिस्तान दुनिया को कुछ और दिखाने की कोशिश कर रहा है क्योंकि जिस तरह से ‘ऑपरेशन सिन्दूर’ के तहत भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान में जमकर तबाही मचाई और उसके 11 एयरबेस तबाह कर दिए, उससे मुनीर की छवि काफी धूमिल हुई है। भारत-पाकिस्तान के इस संघर्ष में जिस तरह से पाकिस्तानी सेना को मुंह की खानी पड़ी उससे उसकी नेतृत्व क्षमता और युद्ध कौशल सवाल उठने लगे थे।
जिन्ना बनने की कोशिश में मुनीर
माना जा रहा है कि, मुनीर ने खुद अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए यह पदोन्नति ली है। पाकिस्तान मामलों के विशेषज्ञ कहते हैं, ‘फील्ड मार्शल की रैंक आमतौर पर सैन्य जीत के बाद दी जाती है, लेकिन यह पहली बार है, जब हार के बाद किसी को (मुनीर) ये सम्मान दिया गया है। ऐसा लगता है कि, ये सम्मान उन्हें हार को छिपाने के मकसद से दिया गया है। जब से असीम मुनीर ने पाकिस्तानी सेना की कमान संभाली है, तब से यह माना जा रहा है कि, वह अपनी मुस्लिम कट्टरता और हिंदू विरोधी मानसिकता को देखते हुए देश के चंद लेकिन सबसे ताकतवर नेताओं में जैसे कि, मोहम्मद अली जिन्ना, जनरल जिया उल हक और परवेज मुशर्रफ, की कटेगिरी में अपना नाम शामिल करना चाहते हैं। ये पाकिस्तान के ऐसे नेता हैं, जो लाखों लोगों के नरसंहार के जिम्मेदार थे।
कश्मीर मुद्दे का खेल रहे दांव
पाकिस्तान का फील्ड मार्शल बनने के बाद जनरल मुनीर की ताकत में भी इजाफा हो गया है। सेना में उसका दबदबा और ज्यादा बढ़ गया है। शाहबाज सरकार के इस फैसले से सेना में जो लोग उनके विरोधी हैं, उन्हें बड़ा झटका लगा है और वे फिलहाल पीछे हटने को मजबूर हो गए हैं। मुनीर पहले से ही खुद को राष्ट्रवादी दिखाने के लिए धार्मिक उन्माद फैलाने वाली बातें कह रहे हैं। वह भी ऐसे समय में जब पाकिस्तान की आर्थिक हालत बेहद खराब है, उसे कर्ज तक नहीं मिल रहा। आम जनता को खाने के लाले पड़े हैं। बावजूद इसके मुनीर कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने का दांव खेल रहे हैं। कश्मीर मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण करने के लिए मुनीर ने तुर्की, अमेरिका और चीन से भी समर्थन मांगा है।
कोर्ट मार्शल से बचाए गये मुनीर

मंगलवार को अचानक जिस तरह से पाकिस्तानी मीडिया के हवाले से मुनीर के प्रमोशन की खबर आई। उसे लेकर विश्लेषकों का मानना है कि, फील्ड मार्शल बना कर मुनीर को संभावित कोर्ट मार्शल से बचा लिया गया है क्योंकि, भारत के साथ हाल ही में हुए संघर्ष में सेना के भीतर उनकी स्थिति अस्थिर होने का डर था। मुनीर से पहले सिर्फ एक पाकिस्तानी जनरल अयूब खान को ही फील्ड मार्शल के पद से नवाजा गया था, जो बाद में तख्तापलट करके पाकिस्तान के सैन्य तानाशाह बन गए थे।
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कारगिल युद्ध भी बना था तख्तापलट की वजह

कुछ समय पहले पाकिस्तान के पूर्व पीएम नवाज शरीफ ने भी माना था कि, 1999 में हुआ कारगिल युद्ध तत्कालीन पाकिस्तानी जनरल परवेज मुशर्रफ द्वारा उनकी सरकार के तख्तापलट की वजह बना था। उस वक्त जनरल परवेज मुशर्रफ ने भी कारगिल युद्ध की साजिश लगभग उसी तरह रची थी, जिस तरह से पहलगाम आतंकी हमले की साजिश रचने का शक जनरल असीम मुनीर पर है। हालांकि, मुनीर और पाकिस्तानी सरकार लगातार इन आरोपों का खंडन कर रही है।
मुशर्रफ की राह पर मुनीर
परवेज मुशर्रफ ने भी कारगिल युद्ध के दौरान कुछ ऐसा ही किया था, लेकिन, साल 2006 में आई अपनी किताब ‘इन द लाइन ऑफ फायर’ में उन्होंने खुद इस बात को स्वीकार किया था कि, कारगिल युद्ध के पीछे पाकिस्तानी सेना का हाथ था, जबकि इससे पहले तक पाकिस्तान भारतीय चौकियों पर चोरी-छिपे कब्जा करने की अपनी करतूतों को नकारता रहा था, लेकिन जब भारतीय सेना ने इस युद्ध में पाकिस्तान को धूल चटा दी और जनरल मुशर्रफ पाकिस्तानी जनता और सेना के बीच अपनी साख खोने लगे, तो कुछ ही महीने बाद अक्टूबर 1999 में उन्होंने सैन्य तख्तापलट कर नवाज शरीफ सरकार को गिरा दिया और पाकिस्तान में मार्शल लॉ लागू कर दिया। अब पाकिस्तानी जनरल असीम मुनीर की हरकतें भी कुछ ऐसी ही लग रही है, वह भी अपने गुरु के मुशर्रफ के नक्शेकदम पर चलने की कोशिश कर रहे हैं और इस बार नवाज के भाई शाहबाज बकरा बन सकते हैं।
कारगिल युद्ध में शामिल थी पाक सेना
बता दें कि, पिछले साल सितंबर में जनरल मुनीर ने भी सार्वजनिक रूप से ये स्वीकार किया था कि, कारगिल युद्ध में पाकिस्तानी सेना शामिल थी। उन्होंने ये कबूलनामा पाकिस्तान के रक्षा एवं शहादत दिवस पर आयोजित एक कार्यक्रम में किया था। इस कार्यक्रम में मुनीर ने जो कहा, वह लगभग वैसा ही था जैसा कि पाकिस्तान के पूर्व सैन्य तानाशाहों के मामले में देखने को मिलता रहा है। कार्यक्रम में मुनीर ने कहा था, ‘पाकिस्तान एक बहादुर देश है। यहां के लोग आजादी की अहमियत समझते हैं और वे इसे किसी भी कीमत पर खोने नहीं देंगे।
ऑपरेशन सिन्दूर जैसे थे हालात

एक्सपर्ट्स का कहना है कि, कारगिल युद्ध के दौरान भी हालात लगभग ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसे ही थे। अपनी सेना का चेहरा बचाने के लिए पाकिस्तान ने खुद स्वीकार किया है कि, अमेरिका ने उस पर कारगिल की चोटियों से पीछे हटने का दबाव बनाया था जबकि, शुरुआत में पाकिस्तानी सेना ने कारगिल में लड़ने वालों को निजी ‘स्वतंत्रता सेनानी’ बताने की कोशिश की थी और कहा था कि, कारगिल युद्ध में पाकिस्तानी सेना शामिल नहीं थी। इससे पहले भी भारत और पाकिस्तान 1948, 1965 और 1971 में आमने सामने चुके हैं और भीषण लड़ाई लड़ चुके हैं। भारत-पाकिस्तान के बीच कारगिल और सियाचिन में भी लड़ाइयां लड़ी गई हैं, जिनमें हजारों जवानों ने शहादत दी है।
पाकिस्तान में तीन बार हो चुका है तख्तापलट
हार के बाद भी जनरल मुनीर को प्रमोशन देने के बाद से सवाल उठ रहा है कि, क्या पाकिस्तान में सब कुछ ठीक है? या फिर पाकिस्तान की शहबाज शरीफ सरकार सेना की मुट्ठी में है। दरअसल, पाकिस्तान में सेना पहले भी तीन बार तख्तापलट कर चुकी है। 1958 में जनरल अयूब खान ने, 1977 में जनरल जिया-उल-हक ने और 1999 में जनरल परवेज मुशर्रफ ने जबरन सत्ता हथिया ली थी। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि, जनरल मुनीर भी अब कुछ ऐसा ही करने की योजना बना रहे हैं?
हथियारों के बल पर छिनी थी सत्ता
विशेषज्ञों का कहना है कि, जनरल अयूब खान ने हथियारों एक दम पर तत्कालीन राष्ट्रपति इस्कंदर अली मिर्जा से सत्ता छीनी थी। इसके बाद साल 1977 में जनरल जिया-उल-हक ने भी उन्हीं के नक्शे कदम पर चलते हुए हथियारों का इस्तेमाल कर सत्ता हथियाई। फिर आया साल 1999 जब जनरल परवेज मुशर्रफ ने नवाज शरीफ को उस वक्त सत्ता से बेदखल कर दिया, जब वे श्रीलंका के दौरे पर थे। पाकिस्तान में सैन्य शासन को नई बात नहीं है। ऐसे में अगर मुनीर ऐसा कुछ करते हैं, तो कोई अचंभे वाली बात नहीं होगी। अब पाकिस्तान को भारत के ‘ऑपरेशन सिन्दूर’ में भी शिकस्त मिली है और पाकिस्तान में इस बार नवाज के भाई शहबाज शरीफ सत्ता में हैं।
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