
निशा शुक्ला
नई दिल्ली। One Country, One Election: एक देश,एक चुनाव को लेकर लंबे समय से बहस चल रही है। इस मुद्दे को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से विचार-विमर्श के बाद आगे बढ़ाया गया। इसके बाद 12 दिसंबर 2024 को पीएम मोदी की अध्यक्षता में हुई केन्द्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में इस विधेयक को मंजूरी भी दे दी गई। तत्पश्चात कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने संविधान के 129वां संशोधन विधेयक को लोकसभा में पेश कर दिया, जिस पर जेपीसी विचार कर रही है। वहीं, इस विधेयक पर आमराय बनाने के लिए अब बीजेपी ने खेल करना शुरू कर दिया है। इसके लिए वह देशव्यापी अभियान चलाने और जनता को इसके फायदे बताने की तैयारी कर रही है।
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जनसंपर्क अभियान चलाने की तैयारी

खबर है कि, बीते जनवरी महीने में दिल्ली में केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान की अध्यक्षता में भाजपा के नेताओं की एक बैठक संपन्न हुई थी, जिसमें ‘एक देश, एक इलेक्शन’ को मान्यता दिलाने के लिए जनसंपर्क अभियान चलाने पर चर्चा हुई थी। बैठक में पार्टी ने विभिन्न सामाजिक संगठनों, गैर-सरकारी संगठनों, शिक्षाविदों, वकीलों और व्यापारिक समूहों अपने इस अभियान में शामिल करने की योजना बनाई। कहा जा रहा है कि, बीजेपी इन चर्चाओं में अपने नेताओं को शामिल कर जनता से इस मुद्दे पर अपनी राय राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भेजने की अपील करेंगी। यानी बैठकों का आयोजन स्वयं सेवी संस्थाएं करेंगी, जिसमें बीजेपी के नेता शामिल होंगे और ‘एक देश, एक चुनाव’ मुद्दे पर अपनी राय रखेंगे। इसके बाद जनता से कहा जायेगा कि वो अपनी राय राष्ट्रपति को भेजें।
आमराय बनाने पर जोर
कार्यकर्ताओं को बांटा गया दस्तावेज
बताया जा रहा है कि इस अभियान की रूपरेखा तभी तैयार कर ली गई थी, जब बिल को संसदीय सत्र के दौरान संयुक्त समिति (जेपीसी) को सौंपा गया था। फ़िलहाल, समिति की तीसरी बैठक 25 फरवरी को होने वाली है। ये भी कहा जा रहा है कि ‘एक देश, एक चुनाव’ के मुद्दे पर भाजपा नेताओं को जनता के बीच क्या बोलना है, ये भी फाइनल कर लिया गया है। पार्टी के कुछ पदाधिकारियों की मानें तो कार्यकर्ताओं को 20-20 पेजों का दस्तावेज बांटा गया है और उन्हें इसे अच्छे से रटने को कहा गया है। इस दस्तावेज में, प्रस्ताव का इतिहास, वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में इसकी जरूरत, इसके फायदे के साथ ही इस पैटर्न पर अन्य देशों में हो रहे चुनावों की पूरी जानकारी दी गई है। कहा जा रहा है कि कार्यकर्ता इसी दस्तावेज के आधार पर जनता के बीच जाएंगे और आमराय बनायेंगे।
दिया गया इन देशों का उदहारण

भाजपा के इस दस्तावेज में कहा गया है कि, लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने से “बेकार खर्च” से बचत होगी। साथ ही शासन में “रुकावट” आने की समस्या खत्म होगी। इसके साथ ही इसमें 1951 से लेकर 1967 तक देश में हुए समानांतर चुनावों के इतिहास पर भी प्रकाश डाला गया है, जब राज्यों में अल्पमत की सरकारें बनने लगीं थीं। दस्तावेज में ये भी उल्लेख किया गया है कि भाजपा ने 1984 में भी समानांतर चुनावों को फिर से लागू करने का वादा किया था। इसके बाद पार्टी ने 2019 के लोकसभा चुनाव के चुनावी घोषणापत्र में भी इसे शामिल किया था। दस्तावेज में स्वीडन और दक्षिण अफ्रीका में हो रहे समांतर चुनावों को बतौर मॉडल पेश किया गया है। बता दें कि, दक्षिण अफ्रीका और स्वीडन में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय चुनाव एक साथ होते हैं।
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बनी रहेगी क्षेत्रीय दलों की प्रासंगिकता
पार्टी द्वारा कार्यकर्ताओं को दिए गये इस दस्तावेज के एक खंड में वर्तमान चुनाव प्रणाली की “चुनौतियों” का भी जिक्र है, जिसमें कहा गया है कि, बार-बार होने वाले चुनाव की वजह से सत्तारूढ़ पार्टी का ध्यान आम तौर पर चुनावी राजनीति पर चला जाता है, जिससे सरकारी नीतियों को लागू करने में देरी होती है। इसमें एक चैप्टर का शीर्षक है- “एक और चुनौती है ‘मुफ्तखोरी की राजनीति का उदय’, जिसमें राज्यों की वित्तीय स्थिति पर प्रभाव डाला गया है और कहा गया है कि चुनाव के दौरान मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट (MCC) लागू होने से जन कल्याणकारी योजनाओं को लागू करने में देरी होती है। ‘एक देश, एक चुनाव’ के बारे में एक सवाल के जवाब के तौर पर लिखा गया है, क्षेत्रीय दल प्रासंगिक बने रहेंगे, ‘एक देश, एक चुनाव’ उनके हितों को कहीं से भी नुकसान नहीं पहुंचाएगा।
इन नेताओं को मिला अभियान का जिम्मा

पार्टी के एक नेता के अनुसार, राष्ट्रीय स्तर पर इस अभियान को सफल बनाने का जिम्मा मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और मौजूदा केन्द्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान, राष्ट्रीय महासचिव सुनील बंसल और राष्ट्रीय सचिव ओम प्रकाश धनखड़ के कंधे पर है। उत्तर प्रदेश में इस कार्यक्रम का संचालन बिहार और मेघालय के पूर्व राज्यपाल फागू चौहान के नेतृत्व में गठित दल के नेता कर रहे हैं। वहीं ओम प्रकाश धनखड़ इसके लिए कोऑर्डिनेशन का काम कर रहे हैं।
अधिकतर दल जता रहे विरोध
बता दें कि, एक देश, एक चुनाव के मुद्दे पर चुनाव आयोग, नीति आयोग, विधि आयोग और संविधान समीक्षा आयोग पहले ही विचार-विमर्श कर चुके हैं। इसी कड़ी में विधि आयोग ने हाल ही में इस मसले पर विभिन्न राजनीतिक दलों, क्षेत्रीय पार्टियों और प्रशासनिक अधिकारियों की राय जानने के लिये तीन दिवसीय कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया था। इस कॉन्फ्रेंस में कुछ राजनीतिक दलों ने इस पर सहमति जताई, लेकिन अधिकतर दलों ने इसका विरोध किया। उनका कहना है कि यह विचार लोकतांत्रिक प्रक्रिया के खिलाफ है। ऐसे में इसे आमराय बनाकर लागू करना टेढ़ी खीर है। फिलहाल, इसमें भाजपा को कितनी सफलता मिलती है ये समय के गर्भ में है।
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