
नई दिल्ली। Pakistan: घरेलू कलह आपके जीवन को उतना अस्त-व्यस्त नहीं करती, जितना आपके पड़ोस में मचा हिंसा का शोर। भारत इस समय ऐसी ही स्थिति का सामना कर रहा है, लेकिन भारत के बारे में अच्छी बात यह है कि वह इस सारे शोर से न तो कभी डरा और न ही आज इससे चिंतित है। दरअसल, भारत के पड़ोसी देश लगातार बेचैन होते जा रहे हैं, जबकि भारत विकास के पथ पर तेज़ी से आगे बढ़ रहा है।
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इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि भारत ने अपने आंतरिक झगड़ों को सुलझाने में कभी किसी देश के हस्तक्षेप को प्राथमिकता नहीं दी और न ही कभी ऐसी किसी चीज़ का समर्थन किया। हालांकि, भारत के पड़ोसी देशों का इस मामले में एक अलग नज़रिया है। अफ़ग़ानिस्तान, जिसने कभी अमेरिकी मदद ली थी और तालिबान को अपनी धरती से खदेड़ दिया था, एक बार फिर तालिबान के कब्ज़े में आ गया है। पाकिस्तान ने तब तालिबान का समर्थन किया और टीटीपी जैसे संगठनों को अपनी धरती पर पनपने दिया। अब वही टीटीपी पाकिस्तान के लिए कांटा बनता जा रहा है।
भारत के पड़ोसी देशों में अशांति

बांग्लादेश में भी स्थिति कुछ ऐसी ही थी। हर मुद्दे पर अमेरिका और चीन से समर्थन की उम्मीद ने बांग्लादेश के लोगों में सरकार के प्रति निराशा पैदा कर दी, जिसकी कीमत लोकतंत्र के मंदिर को ध्वस्त होकर चुकानी पड़ी। नेपाल में वामपंथ की जड़ें बढ़ने लगीं और सरकार चीन की सेवा करने लगी, जो वहां की जनता को पसंद नहीं आया और वहां के युवा सड़कों पर उतर आए। नतीजा वहां की गलियां खून से रंगने लगीं। श्रीलंका में भी कुछ ऐसी ही स्थिति देखने को मिली। यहां के हालात का जिम्मेदार भी चीन को ही माना गया।
ऐसे में, या तो पाकिस्तान समर्थित कट्टरपंथी ताकतें या फिर चीनी हस्तक्षेप, भारत के पड़ोसी देशों में अशांति पैदा करने वाले कारक थे। बाकी कसर अमेरिका के शांत राजनीतिक हस्तक्षेप ने पूरी कर दी, क्योंकि अमेरिका इन देशों में चीन की तैयार जगह को गुप्त रूप से हथियाने की कोशिश कर रहा था और उसकी जड़ें धीरे-धीरे गहरी होती जा रही थीं, जिससे चीन की बेचैनी बढ़ती गई और फिर दोनों के बीच चल रहे संघर्ष का असर इन देशों को झेलना पड़ा।’
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तालिबान सरकार को मान्यता देने की वकालत की थी
अगस्त 2021 में जब तालिबान ने काबुल पर कब्ज़ा किया, तो सबसे ज़्यादा ख़ुशी पाकिस्तान को हुई थी। पाकिस्तान सरकार के तत्कालीन गृह मंत्री शेख़ रशीद अहमद ने अफ़ग़ानिस्तान की सीमा तोरख़म बॉर्डर पर विजय प्रेस कॉन्फ्रेंस की और तालिबान सरकार को मान्यता देने की वकालत की। ऐसा करने वाला वह दुनिया का पहला देश बना। उस समय पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान थे, जो इस समय अपने ही देश में कैदी का जीवन जी रहे हैं। उस वक्त पाकिस्तान तब इस मुगालते में था कि, उसे भारत के ख़िलाफ़ एक मज़बूत पड़ोसी मिल गया है जो भारत के ख़िलाफ़ उसके मंसूबों को पूरा करने में उसकी मदद करेगा। उस समय तक अफ़ग़ानिस्तान को भारत और अमेरिका का समर्थक माना जाता था, लेकिन पाकिस्तान की ये खुशफहमी अब खत्म हो चुकी है। आज भारत और तालिबान एक दोस्त की भूमिका में नजर आ रहे हैं। वहीं पाकिस्तान को तालिबान जमकर नाच नचा रहा है।
20 साल तक किया विद्रोह

आइए देखते हैं, पाकिस्तान और तालिबान का गठजोड़ कैसा था। अफगानिस्तान में पैर जमाने के लिए तालिबान ने 20 साल तक लगातार विद्रोह किया और अमेरिकी नेतृत्व वाले 40 से ज़्यादा देशों के गठबंधन का सामना किया, लेकिन हर बार उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इस काम में पाकिस्तान ने तालिबान का भरपूर साथ दिया। पाकिस्तान तालिबान को फलने-फूलने के लिए न सिर्फ ज़रूरी पोषण देता था, बल्कि ट्रेनिंग आदि के लिए अपनी जमीन भी उपलब्ध कराता था। जी हां इन 20 सालों में, तालिबान नेताओं और लड़ाकों को पाकिस्तान के भीतर, अफ़ग़ानिस्तान की सीमा से लगे इलाकों में पनाह मिली, ठीक उसी तरह जैसे भारत के ख़िलाफ़ साज़िश रचने वाले आतंकवादी पाकिस्तान की धरती पर पनाह पाते हैं। तालिबान नेताओं ने क्वेटा, पेशावर और बाद में कराची जैसे प्रमुख पाकिस्तानी शहरों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
पाकिस्तान में शरिया लागू करना चाहता है टीटीपी
पाकिस्तान में, तालिबान को फलने-फूलने और एक सुरक्षित पनाहगाह स्थापित करने के लिए एक उपयुक्त माहौल मिला, साथ ही एक कट्टरपंथी सोच वाला समाज भी। नतीजतन, दुनिया मानती है कि अगर पाकिस्तान ने तालिबान की विचारधारा का समर्थन और उसके विद्रोहियों को पनाह न दी होती, तो तालिबान फिर कभी उभर नहीं पाता।लेकिन, पाकिस्तान को क्या पता था कि उसकी धरती पर स्थापित तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी), एक दिन उसे निगल जाएगा? अफ़ग़ानिस्तान में सत्ता हासिल करने के बाद तालिबान ने जिस कट्टरपंथी विचारधारा को बढ़ावा दिया, वह कुछ सालों में कुछ हद तक कम हो गई, लेकिन टीटीपी ने पाकिस्तान में शरिया कानून लागू करने के लिए ज़रूर संघर्ष करना शुरू कर दिया। इसके पीछे की वजह साफ़ थी। टीटीपी का मानना था कि शासकों ने पाकिस्तान के लोगों में जो धार्मिक कलंक भर दिए हैं, उनसे उसे फ़ायदा होगा और वह वहां अपनी कट्टरपंथी विचारधारा को आसानी से लागू कर सकेगा।
डूरंड लाइन को लेकर है विवाद

जब तालिबान अफ़ग़ानिस्तान में सत्ता में लौटा, तो पाकिस्तान को लगा कि, वह टीटीपी को अपनी धरती पर सक्रिय होने से रोक पाएगा, लेकिन हुआ इसके उलट। पाकिस्तान में पला-बढ़ा टीटीपी और मज़बूत होता गया। चाहे वह पूर्व पाकिस्तानी प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो की हत्या हो, मलाला यूसुफ़ज़ई पर हमला हो, या पेशावर के आर्मी पब्लिक स्कूल पर हमला हो, इन सभी घटनाओं में टीटीपी का नाम पहले ही आ चुका था। फिर भी, पाकिस्तान में उसे भरपूर समर्थन और पोषण मिलता रहा।
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पाकिस्तान को तब अंदाज़ा भी नहीं था कि अफ़ग़ान तालिबान, पाकिस्तानी तालिबान या टीटीपी उसके पक्के सहयोगी हैं। अब जब टीटीपी ने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया है, तो पाकिस्तान को उम्मीद थी कि तालिबान सरकार उसकी मदद के लिए आगे आएगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हो रहा है। इसकी मुख्य वजह पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच चल रहा सीमा विवाद है। दोनों देशों के बीच अंतरराष्ट्रीय सीमा को डूरंड रेखा कहा जाता है। हालांकि, अफ़ग़ानिस्तान ने इस 2,640 किलोमीटर लंबी सीमा को कभी मान्यता नहीं दी। इसका कारण भी स्पष्ट है क्योंकि पाकिस्तान ने इस सीमा पर बाड़ लगा रखी है, लेकिन पश्तून इसके दोनों ओर रहते हैं और अफगानिस्तान हमेशा से इससे जुड़ा रहा है।
पाक सेना के खिलाफ गुरिल्ला तकनीकी अपनाता है टीटीपी
अब, तालिबान भी मानता है कि डूरंड रेखा के पार, बाड़ के उस पार, पाकिस्तान की सीमा के भीतर, जहां तक पश्तून रहते हैं, अफ़ग़ानिस्तान का हिस्सा है। अफ़ग़ानिस्तान ने कभी भी डूरंड रेखा को आधिकारिक रूप से मान्यता नहीं दी है। हालांकि, यह रेखा पाकिस्तान के जन्म से भी पहले खींची गई थी और इसका उद्देश्य भारत और अफ़ग़ानिस्तान के बीच सीमा का निर्धारण करना था। उस समय, अंग्रेजों ने जानबूझकर इसे खींचा था, जिससे दोनों देशों के बीच संघर्ष की नींव पड़ी क्योंकि इस रेखा को खींचते समय स्थानीय जनजातियों और भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में नहीं रखा गया था।
यह विवाद तब से जारी है और पाकिस्तान के गठन के बाद, यह रेखा अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के बीच संघर्ष का एक स्रोत बन गई। पाकिस्तान स्वयं आर्थिक समस्याओं और आंतरिक राजनीतिक कलह से घिरा हुआ है, जिससे उसकी सेना के लिए कोई भी बड़ा या लंबा अभियान शुरू करना मुश्किल हो रहा है। दूसरी ओर, टीटीपी पाकिस्तानी सेना के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध तकनीकों का इस्तेमाल कर रहा है और हमलों के बाद, उसके लड़ाके अफ़ग़ान सीमा पर भाग रहे हैं, जहाँ अफ़ग़ान तालिबान उन्हें सुरक्षित पनाहगाह, प्रशिक्षण शिविर, धन और हथियार मुहैया कराता है। इसे पाकिस्तानी जनता और सरकार भी स्वीकार करती है।
इस रेखा को नहीं मानते पश्तून

अब, एक और तथ्य पर गौर कीजिए, डूरंड रेखा ईरान और चीन की सीमाओं तक फैली हुई है। इस संदर्भ में, पश्तून इस रेखा को कभी स्वीकार करने को तैयार नहीं रहे। पश्तूनों का हमेशा से आरोप रहा है कि यह रेखा एक साज़िश के तहत खींची गई थी और अंग्रेजों ने एक चाल के तहत पश्तून-बहुल इलाकों में रहने वाले पश्तूनों को दोनों देशों के बीच एक दीवार के भीतर कैद कर दिया था।
जब 2001 में अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला किया, तो पाकिस्तान अमेरिका के साथ खड़ा था, जो टीटीपी की नाराज़गी का एक बड़ा कारण था। उस समय, टीटीपी के लड़ाके पाकिस्तान के इस कदम को इस्लाम के ख़िलाफ़ मानते थे। वर्तमान में, टीटीपी पाकिस्तान में इस्लामी क़ानून लागू करना चाहता है, जैसा कि तालिबान शासन के तहत अफ़ग़ानिस्तान में लागू था। इसके अलावा, टीटीपी पाकिस्तान के सीमावर्ती इलाकों, जैसे खैबर पख्तूनख्वा और दक्षिणी वज़ीरिस्तान, को मिलाकर एक अलग देश बनाना चाहता है और इन इलाकों में उसकी मज़बूत पकड़ है।
आमिर ख़ान मुत्तक़ी ने जम्मू कश्मीर को बताया भारत का हिस्सा
इस बीच, अफ़ग़ान तालिबान पाकिस्तान के ज़ख्मों पर नमक छिड़कने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। एक ओर, वह पाकिस्तान के ख़िलाफ़ टीटीपी का समर्थन कर रहा है। दूसरी ओर, तालिबान के विदेश मंत्री मौलवी आमिर ख़ान मुत्तक़ी ने अपनी भारत यात्रा के दौरान जम्मू-कश्मीर को भारत का हिस्सा घोषित कर दिया। उन्होंने यह भी साफ़ तौर पर कहा कि पाकिस्तान में आतंकवाद से उनका कोई लेना-देना नहीं है, जैसा कि पाकिस्तान सरकार दावा करती है, बल्कि आतंकवाद पाकिस्तान की आंतरिक समस्या है। अब तक, पाकिस्तान यह सोच भी नहीं सकता था कि उसकी ज़मीन पर पनप रहा कोई संगठन उसके ख़िलाफ़ विद्रोह का ऐलान कर देगा, और यह स्थिति पाकिस्तानी सेना के लिए बेहद मुश्किल होने वाली है।
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