
अजय कुमार तिवारी
निंदा और निंदक कभी आउटडेटेड नहीं होते हैं ,उनका धंधा हमेशा जोरों पर रहता है। रामायण, महाभारत काल में निंदा प्रासंगिक थी जो आज भी कायम है। मंथरा, शकुनि अपनी इसी काबलियत पर खेल खेला करते थे। वर्तमान में यह वॉट्सऐप और फेसबुक के माध्यम से जीवित है। इसमें वॉट्सऐप का स्टेटस भी तेजी से सहयोग कर रहा है। किटी पार्टियां भी निंदक और निंदा के लिए मुफीद साबित होती हैं। निंदा हर बोरियत का रामबाण इजाज है। कभी-कभी यह खाना पचाने के काम भी आती है। इससे अपना खाना तो पचता ही है बल्कि दूसरे को जुगाली करने का साधन मिल जाता है। कभी-कभी तो सत्संग में भी निंदा कायम रहती है।
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प्रमाण मांगने की कोशिश नहीं करें
निंदा श्रवण के लिए योग्यता की मांग कभी भूल कर भी नही करें। अच्छे निंदक की योग्यता है और आप इस योग्यता के पैमाने पर खरे नहीं उतरते हैं तो आप अच्छे निंदक नहीं बन सकते हैं। आपकी मानसिकता निंदा और निंदक के पैमाने पर उपजाऊ नहीं है। निंदक से कभी प्रमाण मांगने की कोशिश नहीं करें। यदि आप निंदक से प्रमाण चाहने की हिमाकत करते हैं तो आप अच्छे निंदक के सामने पात्रता विहीन श्रोता हैं। आप अच्छे श्रोता नहीं हो सकते हैं। निंदा के लिए न्यूनतम योग्यता है, बिना पछतावा और बिना प्रमाण के निंदा की जानी चाहिए। निंदा की गुणवत्ता बनाये रखना जरूरी है।
आत्मसंतोष का जीरो टॉलरेंस इन्वेस्ट मॉडल है निंदा
निंदा आत्मसंतोष का जीरो टॉलरेंस इन्वेस्ट मॉडल है। इसमें पूंजी निवेश की जरूरत भी नहीं हैं। यह श्रम साध्य भी नहीं है। इसमें कोई अर्थशास्त्री, इन्कम टैक्स वाले का भय भी नहीं है। आपके पास निंदा का उत्पाद होना चाहिए, इसके उपभोक्ता प्रत्येक जगह मिल जायेंगे। कोने-अतरे, दर ओ दीवार में निंदा की फसल तेज विकास करती है। बड़े-बड़े निंदकाचार्य ने निंदा के पंचकर्म का पालन किया है। उनके विधान में आशंका, अफवाह, अभिनय, अतिशयोक्ति, अभिप्राय विकृति पहले पायदान पर रहती है। इन पंचकर्मों का पालन करने से निंदा की प्रस्तुति कलात्मक और शास्त्रीय तरीके से होगी। दक्षता हासिल होगा। अपने कार्यों में कुशलता, दक्षता ही योग है जो निंदक हासिल करता है। आत्मगौरव के कैक्टस के लिए पर निंदा सबसे बेहतर उपाय है।
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